Thursday, February 5, 2015

सुविधा की लत

अपनी खिड़की पर खड़े होकर पेड़ों की फुनगियों,खुले अहातों, आंगनों में चहचहाती चिड़ियों को देखिये।  क्या इन्हें ज़रा सा भी इस बात का अहसास होता है कि अगले पल ये क्या करेंगी, कहाँ बैठेंगी, कहाँ उड़ जाएँगी, किससे  मिलेंगी , किससे बिछड़ेंगी,क्या खा लेंगी, कौन से पानी के बर्तन पर बैठ जाएँगी, बैठ कर भी पानी पियेंगी या बिना पिये ही उड़ जाएँगी, कौन सी आहट इन्हें डरा देगी,कौन सी आहट इन्हें आकर्षित करेगी। पानी के बुलबुले सी इनकी ज़िंदगी के ठहराव पर सोचिये।
क्या आपको नहीं लगता कि धैर्य,सहिष्णुता,आत्म विश्वास के मामले में हमारी नई नस्लें भी इसी तरह व्यवहार करने की आदी होती जा रही हैं?
शायद इसका कारण यह हो कि हम आभासी,क्षणिक,चलायमान जीवन के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। गहराई, स्थायित्व,प्रतीक्षा,धैर्य जैसी चीज़ें हमारे जीवन से लुप्त होती जा रही हैं।
 सोचिये,पति-पत्नी ऊपरी मंज़िल पर रहते हैं और बाजार जा रहे हैं,पति तैयार होकर नीचे बाहर आ गया है, पत्नी को ताला लगा कर नीचे आना है,नीचे आने में लगभग एक मिनट का समय लगता है, पत्नी अब तक नीचे नहीं आई है, लगभग ढाई मिनट का समय हो गया है, तो यकीन जानिए, उसके पास मोबाइल पर फोन आ जायेगा, "अरे भई क्या हुआ?"
पति का धैर्य यह सोच पाने जितना न होगा कि हो सकता है, उसे भीतर से कुछ लेना याद आ गया हो, रस्ते में कोई परिचित मिल गया हो, लघुशंका की हाज़त हो गयी हो, प्यास ही लग आई हो!
      

3 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 8-2-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1883 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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