प्रकाशित पुस्तकें
उपन्यास: देहाश्रम का मनजोगी, बेस्वाद मांस का टुकड़ा, वंश, रेत होते रिश्ते, आखेट महल, जल तू जलाल तू
कहानी संग्रह: अन्त्यास्त, मेरी सौ लघुकथाएं, सत्ताघर की कंदराएं, थोड़ी देर और ठहर
नाटक: मेरी ज़िन्दगी लौटा दे, अजबनार्सिस डॉट कॉम
कविता संग्रह: रक्कासा सी नाचे दिल्ली, शेयर खाता खोल सजनिया , उगती प्यास दिवंगत पानी
बाल साहित्य: उगते नहीं उजाले
संस्मरण: रस्ते में हो गयी शाम,
Sunday, April 3, 2011
बेचारे उसी युग के जीव
कल शाम को टहलते हुए बीच बाज़ार में एक अद्भुत द्रश्य देखा। एक बड़ी सी ईमारत की छत पर बहुत सारे बन्दर जमा थे और वे अपनी आदत के विपरीत शांति से बैठे हुए थे , मानो किसी मुद्दे पर गहन चिंतन कर रहे हों। प्राय बन्दर चंचल स्वाभाव के होने के कारण झुण्ड में चलते हुए भी कोई न कोई शरारत करते चलते हैं। परन्तु यहाँ उनकी स्थिरता देखते ही बनती थी।नीचे खड़े लोग भी तरह - तरह से उन पर टिप्पणियां कर रहे थे। बच्चे कोतुहल से उन्हें देख कर खुश हो रहे थे। कई लोग वाहन रोक-रोक कर भी नज़ारा देख रहे थे। कोई कह रहा था कि ये शायद लंका को जीत लेने पर भारतीय क्रिकेट टीम को बधाई देनेआये हैं।एक बुज़ुर्ग ने टिपण्णी की - ये लंका को हराने वाले दल के भूतपूर्व सैनिक हैं, इसीलिए आभार मानने आये हैं। बहुत देर तक वे बन्दर लोगों के आकर्षण का केंद्र बने रहे। लेकिन थोड़ी ही देर बाद असलियत उजागर हुयी। पता चला कि बिल्डिंग के पिछवाड़े में बिजली के तार से करेंट लग जाने के कारण एक बन्दर कि मौत हो गयी थी , और उस बन्दर की मृत देह वहां पिछवाड़े में पड़ी थी। उसी के शोक में वे बन्दर उस जगह पर एकत्रित हो गए थे। फिर एक आदमी की टिप्पणी सुनाई दी- यदि कोई आदमी सड़क पर इस तरह घायल होकर गिर जाता तो शायद इनमे से कोई नहीं रुकता। पर बंदरों की संवेदना को देखते हुए एक और बुजुर्ग ने कहा- ये नए ज़माने के थोड़े ही हैं। ये तो बेचारे अभी भी उसी युग को जी रहे हैं।
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