अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव नवम्बर में हैं, जोर आजमाइश चल रही है। लेकिन ओबामा महोदय का एक बयान अख़बारों में छपा है कि "मैं चुनाव हार भी सकता हूँ", यह बात जितनी स्वाभाविकता, संजीदगी, और मासूमियत से कही गई है, उतनी ही सही भी है।
कहीं भी, कभी भी, कोई भी चुनाव हार ही सकता है। चुनाव क्या, हर खेल में हार-जीत तो भविष्य के गर्भ में ही होती है। यदि कहीं यह अहंकार हो, कि मुझे कोई नहीं हरा सकता, तो फिर चुनाव की ज़रुरत ही न रहे।
लेकिन हम यह सब क्यों सोचें, हम तो भारत में हैं।
हमारे यहाँ तो ऐसा कभी कोई सपने में भी नहीं कहता। नाकारा, बण्डलबाज़, खूनी ,चापलूस,चमचा , लुटेरा, चोर, घोटालेबाज, निकम्मा, ...[और जो भी पर्यायवाची हो सकते हों,] चाहे जैसा भी उम्मीदवार हो, वह यह कभी नहीं कहता कि मैं हार भी सकता हूँ। यहाँ तो वोटों की गिनती के दौरान भी यदि यह पता चले कि आप अपने विरोधी से पांच लाख वोटों से पीछे चल रहे हैं, तब भी यही कहा जाता है कि अभी नतीजा पूरा नहीं आया है। इतना ही नहीं, यहाँ तो यदि आप हार ही जाएँ, तब भी यही कहने का रिवाज़ है कि गिनती में घपला हुआ है, जनता तो मुझे ही चाहती है। ऐसे आत्म-विश्वास पर ही तो लोकतंत्र चलता है!
कहीं भी, कभी भी, कोई भी चुनाव हार ही सकता है। चुनाव क्या, हर खेल में हार-जीत तो भविष्य के गर्भ में ही होती है। यदि कहीं यह अहंकार हो, कि मुझे कोई नहीं हरा सकता, तो फिर चुनाव की ज़रुरत ही न रहे।
लेकिन हम यह सब क्यों सोचें, हम तो भारत में हैं।
हमारे यहाँ तो ऐसा कभी कोई सपने में भी नहीं कहता। नाकारा, बण्डलबाज़, खूनी ,चापलूस,चमचा , लुटेरा, चोर, घोटालेबाज, निकम्मा, ...[और जो भी पर्यायवाची हो सकते हों,] चाहे जैसा भी उम्मीदवार हो, वह यह कभी नहीं कहता कि मैं हार भी सकता हूँ। यहाँ तो वोटों की गिनती के दौरान भी यदि यह पता चले कि आप अपने विरोधी से पांच लाख वोटों से पीछे चल रहे हैं, तब भी यही कहा जाता है कि अभी नतीजा पूरा नहीं आया है। इतना ही नहीं, यहाँ तो यदि आप हार ही जाएँ, तब भी यही कहने का रिवाज़ है कि गिनती में घपला हुआ है, जनता तो मुझे ही चाहती है। ऐसे आत्म-विश्वास पर ही तो लोकतंत्र चलता है!