Wednesday, September 2, 2026

मैं जानता हूं कि...

 उड़ान और सामाजिकता का संबंध बेहद दिलचस्प है। आप जितना ऊपर उड़ते जाते हैं समाज नीचे उतना ही आपसे दूर होता जाता है। ये बात शायद उस परिंदे के जेहन में नहीं आती तो परवाज़ के लिए पर तौल रहा होता है।

इस विलोमानुपाती संबंध की सबसे खूबसूरत बात यही है कि जिस पल आप थकते हैं और आपके पंख अब उड़ान से तौबा करने लगते हैं आप छटपटा कर नीचे की ओर ही आते हैं, जहां समाज आपको फ़िर मिल जाता है। 

मैं जानता हूं कि ऐसा होता है फिर भी मुझे उड़ना अच्छा लगता है।

Monday, August 31, 2026

मैं जानता हूं कि...

 ये बात बहुत कॉमन है कि दो पीढ़ियों की सोच में अंतर होता ही है। चाहे दोनों के प्रतिनिधि आपस में पिता पुत्र ही क्यों न हों। एक साथ एक ही घर में एक सा अन्न खाते हुए और एक सी सुविधाएँ पाते हुए भी एक न एक दिन ये बात आ ही जाती है कि पिता को लगता है - इसे हमने जन्म दिया, हमने पाला पोसा, और आज ये हमें ज्ञान दे रहा है कि हमें क्या करना चाहिए क्या नहीं।

दूसरी ओर बेटे को लगता है कि ये अब भी मुझे बच्चा ही समझते हैं। अब मैं अपने पैरों पर खड़ा हूं, खुद कमाता हूं, मुझे अपने भले - बुरे का ध्यान है, अब इनका ज़माना नहीं रहा।

यही पीढ़ी अंतराल है। यह अकारण नहीं है। इसके बहुत से कारण हैं। अब हम एक - एक करके इनकी चर्चा करेंगे।

Wednesday, August 26, 2026

मैं जानता हूं कि...

 ये बात ठीक नहीं, पर किया क्या जाए?

मैं 73 साल का हो गया पर मुझे परस्पर संबंध मेंटेन करना नहीं आया। इस उलझन ने मेरी कई उपलब्धियों की भ्रूणहत्या की है, कई सफलताओं पर पानी फेरा है।

दरअसल मैं किसी से ( रिश्तेदारों को छोड़ कर ) "जैसे को तैसा" संबंध नहीं रख पाता। अर्थात मुझसे यह नहीं हो पाता कि किसी ने आगे बढ़ कर मेरी मदद की है तो मैं भी उसके लिए उतनी ही उदारता से हाथ बढ़ादूं। या यदि किसी ने मेरी निंदा, अवहेलना या उपेक्षा की है तो मैं भी उससे रंजिश पालने के स्तर तक व्यवहार करूँ।

ऐसा नहीं कि मैंने इस व्यवहार का कारण ढूंढने की कोशिश नहीं की। की है, ढूंढ भी लिया है, पर फ़िर भी मेरा मन जिसके साथ जुड़ता है उसने मेरे साथ चाहे जैसा भी व्यवहार किया हो, मैं उसका विरोधी नहीं हो पाता। इसके उलट, ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने मुझसे भरपूर आत्मीयता दर्शाई लेकिन मैं उनका नहीं हो पाया।

मेरा अपना पैमाना है।

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मैं जानता हूं कि...

 कहते हैं कि अपनी कमियाँ किसी को नहीं बतानी चाहिए। आपकी कमजोरियां जानकर लोग इनका ग़लत फायदा उठाते हैं और मौके- बेमौके आपको नीचा दिखाने से नहीं चूकते। ये जानते हुए भी मैं ऐसी कुछ बातें आपके साथ साझा करना चाहता हूं जो स्पष्टतः मेरी कमज़ोरी ही मानी जाएंगी। जो होगा देखा जाएगा। 

1. हम जिस भारतीय समाज में रहते हैं वहां के रस्मो- रिवाज़ कुछ इस तरह के हैं कि यहाँ किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर उसे तरह- तरह से विशेष सम्मान दिया जाता है।

- मृत्यु होने की सूचना मिलते ही उसी गाँव या शहर में रहने वाले सब परिचित/रिश्तेदार/मित्र/सहकर्मी आदि तत्काल उसके घर पहुंचते हैं। चाहे वो किसी भी कार्य या पेशे में हों, उनकी यह प्राथमिकता मानी जाती है कि वे सब काम छोड़ दें और मृतक के घर पहुंचें। मृतक के प्रथम परिवार के निकटतम लोग तो दूसरे शहर में भी हों तो उनके आने की अपेक्षा करते हुए उनकी प्रतीक्षा की जाती है। कई परिवारों में तो विदेश तक से लोग सब कुछ छोड़ कर आते दिखाई देते हैं।

ऐसे समय उनसे कहीं कोई ये पूछने वाला नहीं होता है आप जिस नौकरी या व्यवसाय में हैं उसका दायित्व छोड़ कर आप कैसे जा सकते हैं। आपका ये कहना पर्याप्त होता है कि "गमी" हो गई है और आपको जाना है। बाधा पहुंचाने वाले या रोक- टोक करने वाले को समाज विरोधी की नज़र से देखा जाता है।

ये सिलसिला सामर्थ्य और सुविधा के अनुसार कई दिन तक चलता है। दाह संस्कार, तीसरे दिन श्रद्धांजलि बैठक, लगभग दो सप्ताह बाद कोई आयोजन, वार्षिक आयोजन आदि। इन आयोजनों के अपने अपने विधि - विधान हैं। आपको बैठा कर ऐसी बातें समझाई जाती हैं जो बार - बार सुन लेने के कारण आप जानते हैं। फ़िर भी उनके पालन - अनुपालन का दायित्व किसी के पास नहीं होता। केवल "लोग क्या कहेंगे" के दबाव और औपचारिकता के बीच ये उपक्रम सम्पन्न होते हैं। जाने वाला तो तब तक उस अनजान दुनिया में कब का लौट चुका होता है जिससे वह आया था।

यहाँ मेरी कमज़ोरी यह है कि मैं इन क्रिया- विधियों से मन से नहीं जुड़ पाता। मुझे लगता है कि ये विधान जाने वाले से ताल्लुक नहीं रखते बल्कि शेष बचे हुए लोगों के लिए हैं और इसलिए इनकी समयबद्धता की कोई आवश्यकता नहीं है, ये परस्पर सुविधा और समयानुसार कभी भी आयोजित हो सकते हैं, यदि ज़रूरी समझे जाएँ। इनकी वजह से दुनिया के सामान्य कार्यों को रोक देने या अव्यवस्थित कर देने का कोई औचित्य मुझे नहीं लगता। मैं इनमें जाने से बचता हूं।

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मैं जानता हूं कि...

 उड़ान और सामाजिकता का संबंध बेहद दिलचस्प है। आप जितना ऊपर उड़ते जाते हैं समाज नीचे उतना ही आपसे दूर होता जाता है। ये बात शायद उस परिंदे के ...

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