Wednesday, August 26, 2026

मैं जानता हूं कि...

 कहते हैं कि अपनी कमियाँ किसी को नहीं बतानी चाहिए। आपकी कमजोरियां जानकर लोग इनका ग़लत फायदा उठाते हैं और मौके- बेमौके आपको नीचा दिखाने से नहीं चूकते। ये जानते हुए भी मैं ऐसी कुछ बातें आपके साथ साझा करना चाहता हूं जो स्पष्टतः मेरी कमज़ोरी ही मानी जाएंगी। जो होगा देखा जाएगा। 

1. हम जिस भारतीय समाज में रहते हैं वहां के रस्मो- रिवाज़ कुछ इस तरह के हैं कि यहाँ किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर उसे तरह- तरह से विशेष सम्मान दिया जाता है।

- मृत्यु होने की सूचना मिलते ही उसी गाँव या शहर में रहने वाले सब परिचित/रिश्तेदार/मित्र/सहकर्मी आदि तत्काल उसके घर पहुंचते हैं। चाहे वो किसी भी कार्य या पेशे में हों, उनकी यह प्राथमिकता मानी जाती है कि वे सब काम छोड़ दें और मृतक के घर पहुंचें। मृतक के प्रथम परिवार के निकटतम लोग तो दूसरे शहर में भी हों तो उनके आने की अपेक्षा करते हुए उनकी प्रतीक्षा की जाती है। कई परिवारों में तो विदेश तक से लोग सब कुछ छोड़ कर आते दिखाई देते हैं।

ऐसे समय उनसे कहीं कोई ये पूछने वाला नहीं होता है आप जिस नौकरी या व्यवसाय में हैं उसका दायित्व छोड़ कर आप कैसे जा सकते हैं। आपका ये कहना पर्याप्त होता है कि "गमी" हो गई है और आपको जाना है। बाधा पहुंचाने वाले या रोक- टोक करने वाले को समाज विरोधी की नज़र से देखा जाता है।

ये सिलसिला सामर्थ्य और सुविधा के अनुसार कई दिन तक चलता है। दाह संस्कार, तीसरे दिन श्रद्धांजलि बैठक, लगभग दो सप्ताह बाद कोई आयोजन, वार्षिक आयोजन आदि। इन आयोजनों के अपने अपने विधि - विधान हैं। आपको बैठा कर ऐसी बातें समझाई जाती हैं जो बार - बार सुन लेने के कारण आप जानते हैं। फ़िर भी उनके पालन - अनुपालन का दायित्व किसी के पास नहीं होता। केवल "लोग क्या कहेंगे" के दबाव और औपचारिकता के बीच ये उपक्रम सम्पन्न होते हैं। जाने वाला तो तब तक उस अनजान दुनिया में कब का लौट चुका होता है जिससे वह आया था।

यहाँ मेरी कमज़ोरी यह है कि मैं इन क्रिया- विधियों से मन से नहीं जुड़ पाता। मुझे लगता है कि ये विधान जाने वाले से ताल्लुक नहीं रखते बल्कि शेष बचे हुए लोगों के लिए हैं और इसलिए इनकी समयबद्धता की कोई आवश्यकता नहीं है, ये परस्पर सुविधा और समयानुसार कभी भी आयोजित हो सकते हैं, यदि ज़रूरी समझे जाएँ। इनकी वजह से दुनिया के सामान्य कार्यों को रोक देने या अव्यवस्थित कर देने का कोई औचित्य मुझे नहीं लगता। मैं इनमें जाने से बचता हूं।

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