कुछ लोग समझते हैं कि केवल सुन्दर,मनमोहक व सकारात्मक ही लिखा जाना चाहिए। नहीं-नहीं,साहित्य को इतना सजावटी बनाने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा। साहित्य जीवन का दस्तावेज़ है। यदि आप अपने घर से बाहर निकल कर कुछ देखने का जोख़िम नहीं लेना चाहते,तो अपना घर ही देखिये-वहां भी एक भाग में,जहाँ आप पूजा करते हैं,आप जूते उतार देते हैं। किन्तु उसी घर के दूसरे हिस्से में जहाँ शौच के लिए जाते हैं,खोज कर चप्पल पहन लेते हैं। जीवन की यह विविधता साहित्य में भी आएगी। साहित्य केवल भजन-आरती नहीं है,जिसे आप पूजाघर के सुवासित वातावरण में ही लिख लें,वह आपकी जीवन-कथा का छायाकार है, वह आपके साथ पूजाघर में भी जायेगा,शयनकक्ष में भी,और मेहमानख़ाने में भी। ड्राइंगरूम और स्नानघर में भी।
प्रकाशित पुस्तकें
उपन्यास: देहाश्रम का मनजोगी, बेस्वाद मांस का टुकड़ा, वंश, रेत होते रिश्ते, आखेट महल, जल तू जलाल तू
कहानी संग्रह: अन्त्यास्त, मेरी सौ लघुकथाएं, सत्ताघर की कंदराएं, थोड़ी देर और ठहर
नाटक: मेरी ज़िन्दगी लौटा दे, अजबनार्सिस डॉट कॉम
कविता संग्रह: रक्कासा सी नाचे दिल्ली, शेयर खाता खोल सजनिया , उगती प्यास दिवंगत पानी
बाल साहित्य: उगते नहीं उजाले
संस्मरण: रस्ते में हो गयी शाम,
Sunday, August 12, 2018
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शोध
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