आपने इस बात पर ध्यान दिया होगा कि अमेरिकी शासन की एक बहुत प्रभावशाली खासियत है। वह किसी भी देश के सत्ता गलियारों से पहले वहां के जन मानस के मन- गलियारों में जगह बनाने के रास्तों पर चलता है। यह बात अलग है कि अपनी राष्ट्रीयता की भावना के चलते लोग उसे मन से स्वीकार करने में संकोच करें। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि लोग भीतर से अमेरिकी प्रभुसत्ता के कायल होते हैं, किन्तु बहुत सारे बाहरी कारक उन्हें इस भावना को अभिव्यक्त करने से रोकते हैं। यह एक सर्वमान्य सत्य है कि कई बार किसी का श्रेष्ठता-भाव [सुपीरियरिटी काम्प्लेक्स ]केवल हमें इसलिए तंग करता है कि हम अपने हीनता-भाव [इनफीरियारिटी काम्प्लेक्स ]से निजात पाने में सक्षम नहीं हो पाते। किसी भी समस्या पर पैनी नज़र रखना, उस पर पहल करके उसके हल हेतु सामने आना, सहयोग करते समय नेतृत्व की भावना से प्रयासों की अगुवाई करना किसी भी तरह साम्राज्यवाद का पोषण नहीं कहा जा सकता। यह तो कहीं भी, कभी भी व्यष्टि अथवा समष्टि रूप में ज़रूरी है ही।किसी न किसी को तो करना ही होगा। करना चाहिए। केवल एक बड़ा देश इसे कर रहा है, इस आधार पर उस पर अंगुली नहीं उठाई जा सकती। यह बात समझने के लिए देशों की ही नहीं , अपने घर की कूट- नीति पर ही नज़र डालिए। क्या वहां भी ऐसा ही नहीं होता? बड़े बनने की अभि -प्रेरणा और नेतृत्व करने का प्रशिक्षण इन्ही परिस्थितियों से ही तो पैदा होते हैं। मुझे यह कहने में ज़रा भी संकोच नहीं है कि मनमोहन सिंह जी अमेरिका जाने पर अमेरिकी अवाम से घुलने - मिलने में ऐसी दिलचस्पी नहीं लेते जैसी ओबामा या क्लिंटन भारतियों से मिलने में लेते हैं। हमारे नेता वहां जाकर भी केवल अपने देश के प्रवासियों की बात करते हैं। ओबामा ने यहाँ आकर यह नहीं कहा कि वे अमेरिकियों से मिलेंगे।
प्रकाशित पुस्तकें
उपन्यास: देहाश्रम का मनजोगी, बेस्वाद मांस का टुकड़ा, वंश, रेत होते रिश्ते, आखेट महल, जल तू जलाल तू
कहानी संग्रह: अन्त्यास्त, मेरी सौ लघुकथाएं, सत्ताघर की कंदराएं, थोड़ी देर और ठहर
नाटक: मेरी ज़िन्दगी लौटा दे, अजबनार्सिस डॉट कॉम
कविता संग्रह: रक्कासा सी नाचे दिल्ली, शेयर खाता खोल सजनिया , उगती प्यास दिवंगत पानी
बाल साहित्य: उगते नहीं उजाले
संस्मरण: रस्ते में हो गयी शाम,
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