प्रकाशित पुस्तकें
उपन्यास: देहाश्रम का मनजोगी, बेस्वाद मांस का टुकड़ा, वंश, रेत होते रिश्ते, आखेट महल, जल तू जलाल तू
कहानी संग्रह: अन्त्यास्त, मेरी सौ लघुकथाएं, सत्ताघर की कंदराएं, थोड़ी देर और ठहर
नाटक: मेरी ज़िन्दगी लौटा दे, अजबनार्सिस डॉट कॉम
कविता संग्रह: रक्कासा सी नाचे दिल्ली, शेयर खाता खोल सजनिया , उगती प्यास दिवंगत पानी
बाल साहित्य: उगते नहीं उजाले
संस्मरण: रस्ते में हो गयी शाम,
Thursday, April 7, 2011
गाँधी से हजारे तक कुतर्क शास्त्र ने भी उन्नति की है
दिल्ली के जंतर-मंतर पर अन्ना हजारे आमरण अनशन पर बैठे हैं। उनका मुद्दा मूलरूप से ' सरकार से लोकपाल विधेयक को पारित ' कराने का है, जो मोटे तौर पर देश में व्याप्त और निरंतर बढ़ रहे भ्रष्टाचार से जुड़ा है। उन्हें देश के करोड़ों लोगों से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष समर्थन मिल रहा है। शायद देश के साधारण आदमी की साधारण समझ यही है कि इस से भ्रष्टाचार मिटेगा। साधारण आदमी को प्राय संदेह के घेरे में रख कर नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि यही साधारण आदमी लोकतंत्र में असाधारण नेताओं का भाग्य-विधाता होता आया है। किन्तु इस अवसर पर देश की सत्ता से जुड़े वरिष्ठ अधिकारी और नेता हजारे के विपक्ष में जो तर्क दे रहे हैं, वे बेहद निराशा-जनक ही नहीं , बल्कि ' कुतर्क ' की श्रेणी में आने वाले हैं। कहा जा रहा है कि समाजवादियों के दबाव में सरकार फैसले नहीं ले सकती। यदि उन्हें देश के कानून बनाने का हक़ चाहिए तो पहले चुनाव लड़ कर देश की संसद में आना चाहिए। तर्क-शास्त्री ऐसी बातों से प्रसन्न हो सकते हैं।किन्तु जिनके मुखारविंद से ऐसे उद्गार प्रकट हो रहे हैं , उन्हें ज़रा सा यह बात भी समझनी चाहिए कि नैतिक मूल्य भी कोई चीज़ होती है। कल यदि किसी बैंक लूट कर निकले चोर को कोई आम शहरी रोकने की कोशिश करने लगे तो शायद वह भी कहने लगे कि यदि मुझे रोकना है तो तुम्हे पहले बैंक के चौकीदार की नौकरी में आना चाहिए।ऐसे तर्क हमारे भाग्य लिख रहे अफसरों के मानसिक दिवालिया पन के ही द्योतक हैं। गाँधी ने तो कभी चुनाव लड़ कर कोई पद नहीं लिया था फिर क्यों उनके हर जन्मदिन पर सरकारी लोग तमाशे करने से नहीं चूकते ?
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शोध
आपको क्या लगता है? शोध शुरू करके उसे लगातार झटपट पूरी कर देने पर नतीजे ज़्यादा प्रामाणिक आते हैं या फिर उसे रुक- रुक कर बरसों तक चलाने पर ही...
आपकी बात एकदम सही है। ऐसे उद्दण्ड कुतर्की को टीवी पर समय देना भी शर्मनाक है। यह व्यक्ति कहना चाहता है कि जितने भारतीय सन्सद के बाहर हैं, उसकी नज़र में उनकी कोई कीमत नहीं है।
ReplyDeletekutark ispat se bana hua nahin hota, vah to gubbare ki tarah hota hai. ham-aap jaise log zara us par anguli uthayenge to uski hawa turant nikal jayegi.
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