अमेरिका और भारत, दोनों में लोकतंत्र है। लोकतंत्र में लोक, अर्थात जनता की भागीदारी होना बहुत ज़रूरी है। कभी-कभी ऐसा होता है कि जनता की भागीदारी चुनाव में बहुत चिंताजनक स्तर तक कम हो जाती है। विशेषकर भारत में जब कभी चुनावी माहौल ठंडा या उदासीन दिखाई देता है तो वोट डालने वालों का प्रतिशत गिर कर २०-२५ % तक भी आ जाता है। ऐसे में कभी- कभी तो मात्र १० %वोट पाने वाला भी जीत जाता है। तब ऐसा अहसास होता है कि निर्वाचित व्यक्ति जनता का सही प्रतिनिधित्व नहीं करता। क्या ऐसी स्थिति में चुनाव को ख़ारिज कर के दोबारा मतदान की प्रक्रिया अपनाई जाये? शायद नहीं। क्योंकि ऐसी परिस्थितियों में इन बातों पर सोचना ज़रूरी है-
जो लोग वोट देने नहीं आये उनके विश्लेषण की ज़रूरत है। कभी- कभी ऐसा होता है कि सभी उम्मीदवारों को नाकाबिल जान कर जनता यह रुख अख्तियार करती है कि जो हो रहा है, सो ठीक है। हम इसे - ' कोऊ नृप होय हमें का हानी ' वाली भावना कहते हैं।शायद अब तो लोग ऐसा सोचते हैं कि - कोऊ नृप होय हमें का लाभ?ऐसे में चुनाव को खारिज करके दोबारा चुनाव की मशक्कत करने का कोई फायदा नहीं है।
लेकिन ऐसी परिस्थितियों में जीतने वाले की क्षमता या उपलब्धि को कम करके आंकना क्या उचित है? निश्चित ही नहीं। यहाँ हमें यही मानना होगा कि जो लोग वोट डालने की ज़हमत उठाने नहीं आये वे परोक्ष रूप से जीतने वाले के साथ ही हैं।इसे ऐसे समझिये- क्रिकेट के वर्ल्ड कप में कुल १४ टीमे भाग ले रही हैं। क्या जो टीम जीतेगी वह मात्र १४ देशों की विजेता होगी ? नहीं ना ? तो ठीक ऐसे ही जो लोग मैदान में नहीं आये हैं, वे विजेता को पहले ही स्वीकार कर चुके हैं। अतः लोकतंत्र को केवल संख्या का खेल नहीं माना जा सकता , चाहे बात किसी भी देश की हो।
प्रकाशित पुस्तकें
उपन्यास: देहाश्रम का मनजोगी, बेस्वाद मांस का टुकड़ा, वंश, रेत होते रिश्ते, आखेट महल, जल तू जलाल तू
कहानी संग्रह: अन्त्यास्त, मेरी सौ लघुकथाएं, सत्ताघर की कंदराएं, थोड़ी देर और ठहर
नाटक: मेरी ज़िन्दगी लौटा दे, अजबनार्सिस डॉट कॉम
कविता संग्रह: रक्कासा सी नाचे दिल्ली, शेयर खाता खोल सजनिया , उगती प्यास दिवंगत पानी
बाल साहित्य: उगते नहीं उजाले
संस्मरण: रस्ते में हो गयी शाम,
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