Sunday, February 20, 2011

एक और कविता

मेरी एक और लम्बी कविता - रक्कासा सी नाचे दिल्ली जल्दी ही आप पढेंगे। दिल्ली में लगभग ८ साल रहने के दौरान मैंने देखा कि इस शहर में कुछ है जो इसे औरों से तो अलग करता ही है,इसे हर पल अपने-आप से भी अलग करता है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह शहर पल-पल रंग बदलता है। यह बनता है,यह बिगड़ता है,यह फिर बनता है।
दिल्ली की गलियों में मानसिक पर्यटन का अपना ही मज़ा है। तो लीजिये सुनिए-एक नई सदी में पुराने ऐतिहासिक शहर के धमाल की दिलचस्प दास्ताँ- "रक्कासा सी नाचे दिल्ली"
गिल्ली डंडे की बाज़ी में अब 'कॉमन-वेल्थ' शॉट जड़ती
दिल्ली अब छोड़ बीसवीं को,इक्कीस सदी में लो बढ़ती
ऊँची मीनारों की दिल्ली,ऊँचे किरदारों की दिल्ली
ऊँची जनता ,ऊँचे नेता ,ऊँचे सरदारों की दिल्ली

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