Sunday, February 20, 2011

रक्कासा सी नाचे दिल्ली 6

ये दिल्ली नगरी ड्रामा की ,ये दिल्ली है लिटरेचर की
दर्पण समाज का लिटरेचर,दिल्ली दर्पण लिटरेचर की
पढनी हों गीता-रामायण तो दुर्लभ हैं,ढूंढो भाई
'पीले-शास्त्रों ' को गली-गली उपलब्ध कराती है दिल्ली
उनके पोथे दीमक चाटे जो खून-पसीने से लिखते
पर अभिनन्दन उनके होते जिनके पग मद डगमग होते
सम्मान-हिंडोला झूल रहे जो इसकी चरण-चाकरी कर
है उन पर इसका वरद-हस्त उनकी सौ माफ़ करे दिल्ली
अपनी ये मथुरा-मक्का है,ये काशी है ये है काबा
चालीसों और संग होंगे ,है दिल्ली एक अलीबाबा
भीतर हों राम-कृष्ण-विष्णु है कोई फर्क नहीं प्यारे
मंदिर होते इकसार सभी जो भी बनवाती है दिल्ली
पहले देवों की शान और थे सुरा लगाते होठों से
अब देवगणों के प्रायोजक 'थम्स-अप 'बूते पर नोटों के
बिरला की छत्तर-छाया में, हे नमो-नमो नारायण तुम ?
मंदिर को बिरला बनवाते , बिरला को बनवाती दिल्ली

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