Saturday, August 4, 2012

ये मेरी ही गलती थी

हम दो दिशाओं से आगे बढ़ने के रास्ते पाते हैं - एक तकनीक से और दूसरा भावना से. यदि दोनों में संतुलन रहे तो गति सहज- सुगम हो जाती है. इस तराजू का इस्तेमाल मुझे कभी ठीक से नहीं आया. मैं ने तकनीक की हमेशा अनदेखी की और भावना को सर्वोपरि समझा. कभी-कभी मेरा यही असंतुलन आपसे बातचीत करने में व्यवधान बनता है.मैं तकनीक को साथ नहीं लेता और भावना से कहता हूँ की वह मुझे गंतव्य तक ले चले .बस यहीं हमारे बीच संवाद अंतराल आ जाता है.भावना को भी आखिर कोई माध्यम तो चाहिये.  

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