और इस तरह मैंने मान ली स्मार्ट इंडियन और मृत्युंजय कुमार की बात। शुभकामना दीजिये कि मेरा संकल्प पूरा हो।
प्रकाशित पुस्तकें
उपन्यास: देहाश्रम का मनजोगी, बेस्वाद मांस का टुकड़ा, वंश, रेत होते रिश्ते, आखेट महल, जल तू जलाल तू
कहानी संग्रह: अन्त्यास्त, मेरी सौ लघुकथाएं, सत्ताघर की कंदराएं, थोड़ी देर और ठहर
नाटक: मेरी ज़िन्दगी लौटा दे, अजबनार्सिस डॉट कॉम
कविता संग्रह: रक्कासा सी नाचे दिल्ली, शेयर खाता खोल सजनिया , उगती प्यास दिवंगत पानी
बाल साहित्य: उगते नहीं उजाले
संस्मरण: रस्ते में हो गयी शाम,
Monday, December 31, 2012
संकल्प
समय किसी उफनती धारा के किनारे डगमगा रहा है। थोड़ी ही देर में मिट्टी की तरह भरभरा कर बहते पानी में जा मिलेगा। मौजूदा साल आशीर्वाद देकर आगे बढ़ते किसी संन्यासी की भाँति ओझल होकर चला जायेगा। इसकी जगह एक नया साल ले लेगा, ठीक वैसे ही, जैसे बासी सांस के मुंह से निकलते ही ताज़ी हवा फिर से नई सांस बन कर जीवन की आस बढ़ा देती है।
मैंने नए साल का "संकल्प" ले लिया है।
मैं इस साल अपने हर दिन को पिछले बीते दिन पर श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश करूंगा। और हाँ, हर महीने कुछ ऐसे लोगों के साथ मिलकर थोड़ा समय ज़रूर गुज़ारूंगा,जो इस समय को बिता कर मन से खुश हों।
आप सभी को नव वर्ष की अनेकों मंगल कामनाएं!
"कल आपको एक चावल के दाने के बराबर ख़ुशी मिले। परसों दो दानों के बराबर। उस से अगले दिन चार दानों के बराबर। और उस से भी अगले दिन आठ दानों के बराबर। इसी तरह वर्ष- भर यह गणित चलती रहे।"
मैंने नए साल का "संकल्प" ले लिया है।
मैं इस साल अपने हर दिन को पिछले बीते दिन पर श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश करूंगा। और हाँ, हर महीने कुछ ऐसे लोगों के साथ मिलकर थोड़ा समय ज़रूर गुज़ारूंगा,जो इस समय को बिता कर मन से खुश हों।
आप सभी को नव वर्ष की अनेकों मंगल कामनाएं!
"कल आपको एक चावल के दाने के बराबर ख़ुशी मिले। परसों दो दानों के बराबर। उस से अगले दिन चार दानों के बराबर। और उस से भी अगले दिन आठ दानों के बराबर। इसी तरह वर्ष- भर यह गणित चलती रहे।"
Friday, December 28, 2012
रोगी हिन्दुस्तान और हकीम सिंगापुरी
जो बात कल तक परदे में थी, बाहर भी आकर रही।
सूरज भी एक फेरे में एक बार उगता है, और एक ही बार डूबता है। लेकिन भारत के लिए ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। वह एक घटना से भी बार-बार शर्मसार हो सकता है।
राजधानी की सड़कों पर भविष्य की एक डाक्टर के साथ नियति ने पैशाचिक दरिंदगी के साथ पुरुष का जो रूप दिखाया, उस से हिंदुस्तान सकते में ही था कि एक महिला का फफूंद और कीड़े पड़ा घिनौना बयान आ गया कि पीड़िता को आत्मसमर्पण कर देना चाहिए था।
देश इसे सुन कर अपने भूत-भविष्य-वर्तमान पर मनन कर ही रहा था कि एक माननीय नेता के मुखारविंद से ऐसे उदगार फूटे-"जो महिलाएं ऐसी घटनाओं पर विरोध-प्रदर्शन करती हैं, वे तैयार होकर डिस्को आदि में क्यों आ जाती हैं?" उनका आशय यह था कि डिस्कोथेक जैसी जगह तो केवल पुरुषों के उछलने-कूदने के लिए है।
और फिर देश ने अपनी महिमा पर एक वार और झेला-"पीड़िता का इलाज यहाँ नहीं हो पा रहा, उसे सिंगापूर रवाना किया गया है।"अर्थात देश के हजारों हस्पताल इलाज के लिए नहीं हैं, वे तो मोटे डोनेशनों से डिग्री बांटने और आरक्षणों से नौकरियां देने के लिए हैं। सच है, जिस देश में डाक्टर की 'ऐसी' क़द्र होगी, वह इलाज के लिए दूसरे देशों का मुंह ही ताकेगा। ठीक है???
सूरज भी एक फेरे में एक बार उगता है, और एक ही बार डूबता है। लेकिन भारत के लिए ऐसी कोई पाबंदी नहीं है। वह एक घटना से भी बार-बार शर्मसार हो सकता है।
राजधानी की सड़कों पर भविष्य की एक डाक्टर के साथ नियति ने पैशाचिक दरिंदगी के साथ पुरुष का जो रूप दिखाया, उस से हिंदुस्तान सकते में ही था कि एक महिला का फफूंद और कीड़े पड़ा घिनौना बयान आ गया कि पीड़िता को आत्मसमर्पण कर देना चाहिए था।
देश इसे सुन कर अपने भूत-भविष्य-वर्तमान पर मनन कर ही रहा था कि एक माननीय नेता के मुखारविंद से ऐसे उदगार फूटे-"जो महिलाएं ऐसी घटनाओं पर विरोध-प्रदर्शन करती हैं, वे तैयार होकर डिस्को आदि में क्यों आ जाती हैं?" उनका आशय यह था कि डिस्कोथेक जैसी जगह तो केवल पुरुषों के उछलने-कूदने के लिए है।
और फिर देश ने अपनी महिमा पर एक वार और झेला-"पीड़िता का इलाज यहाँ नहीं हो पा रहा, उसे सिंगापूर रवाना किया गया है।"अर्थात देश के हजारों हस्पताल इलाज के लिए नहीं हैं, वे तो मोटे डोनेशनों से डिग्री बांटने और आरक्षणों से नौकरियां देने के लिए हैं। सच है, जिस देश में डाक्टर की 'ऐसी' क़द्र होगी, वह इलाज के लिए दूसरे देशों का मुंह ही ताकेगा। ठीक है???
Wednesday, December 26, 2012
उसकी आँखों में आंसू थे , इसलिए मैंने ऐसा कहा
वह बीच चौराहे पर बैठ कर गठरी बाँध रहा था। न जाने क्या-क्या था, सिमटने में ही नहीं आती थी गठरी। उसकी आँखों में आंसू थे। मुझे बड़ा अचम्भा हुआ, कोई इतना कुछ ले जा रहा हो,तो फिर रोने की क्या बात? मैंने उससे पूछ ही लिया- "बाबा तुम्हारे पास इतना ढेर सारा असबाब है, फिर क्यों रो रहे हो?"
उसने कातर दृष्टि से मुझे देखा, और बोला-"जितना है, उससे कहीं ज्यादा तो मैं छोड़ कर जा रहा हूँ।"
"अरे, तो उसे भी ले जाओ, तुम्हें कौन रोक रहा है?" मैंने कहा।
वह बोला - " बेटा , मैं उसे ले नहीं जा सकता, मुझे इजाज़त नहीं है। "
" तो फिर ख़ुशी-ख़ुशी जाओ, वैसे भी कुछ लेकर जाने से तो कुछ देकर जाना ही हमेशा अच्छा होता है।" मैंने कहा।
वह ग़मगीन होकर बोला- " बेटा , मुझे कुछ छोड़ कर जाने का गम नहीं है, मैं तो इसलिए उदास हूँ, कि फिर अब मेरा यहाँ आना कभी नहीं होगा, मैं बस यहाँ चार दिन का मेहमान हूँ । " इतना कहते ही उसके आँसूं और भी तेज़ी से बहने लगे।
मैंने भरे गले से पूछा- " तुम्हारा नाम क्या है बाबा?"
वह बोला- "दो हज़ार बारह।"
मैंने उस से कहा- "ओह, तुम ख़ुशी से जाओ बाबा, खुदा हाफिज! तुम्हारे ये आंसू बेकार नहीं जायेंगे"
"क्यों?" उसने हैरत से कहा।
मैं बोला- "इस पानी में दर्द घुले हैं,
इस पानी में प्यास घुली है,
इससे वाबस्ता हैं रिश्ते,
इस पानी में आस घुली है,
इस पानी में नमक है जब तक,
तब तक है जीवन स्वादिष्ट!"
उसने कातर दृष्टि से मुझे देखा, और बोला-"जितना है, उससे कहीं ज्यादा तो मैं छोड़ कर जा रहा हूँ।"
"अरे, तो उसे भी ले जाओ, तुम्हें कौन रोक रहा है?" मैंने कहा।
वह बोला - " बेटा , मैं उसे ले नहीं जा सकता, मुझे इजाज़त नहीं है। "
" तो फिर ख़ुशी-ख़ुशी जाओ, वैसे भी कुछ लेकर जाने से तो कुछ देकर जाना ही हमेशा अच्छा होता है।" मैंने कहा।
वह ग़मगीन होकर बोला- " बेटा , मुझे कुछ छोड़ कर जाने का गम नहीं है, मैं तो इसलिए उदास हूँ, कि फिर अब मेरा यहाँ आना कभी नहीं होगा, मैं बस यहाँ चार दिन का मेहमान हूँ । " इतना कहते ही उसके आँसूं और भी तेज़ी से बहने लगे।
मैंने भरे गले से पूछा- " तुम्हारा नाम क्या है बाबा?"
वह बोला- "दो हज़ार बारह।"
मैंने उस से कहा- "ओह, तुम ख़ुशी से जाओ बाबा, खुदा हाफिज! तुम्हारे ये आंसू बेकार नहीं जायेंगे"
"क्यों?" उसने हैरत से कहा।
मैं बोला- "इस पानी में दर्द घुले हैं,
इस पानी में प्यास घुली है,
इससे वाबस्ता हैं रिश्ते,
इस पानी में आस घुली है,
इस पानी में नमक है जब तक,
तब तक है जीवन स्वादिष्ट!"
Friday, December 21, 2012
हम कितने किसके हैं?
यदि कोई किसी को मार देता है, तो सबके पास ये विकल्प हैं-
1.उस से डर कर सब छिप जाएँ, कि वह औरों को भी मार देगा।
2.उसे भी मार दिया जाए, और मारने की प्रक्रिया ऐसी अपनाई जाए कि उसे देख कर कोई अपने होश-हवास में किसी और को मारने के बारे में भूल कर भी न सोचे।
3.मारने वाला उसके परिजनों को कुछ रूपये का मुआवजा दे, जिसे उसने मार दिया है।
4.सब मिलकर मरने वाले के परिवार को ढाढ़स बंधाएं।
5.मारने वाले को पकड़ कर सीमित भोजन देते हुए ऐसी कोठरी में बंद कर दिया जाए, जहाँ उसके ह्रदय में पश्चाताप और ह्रदय परिवर्तन की संभावना जन्म ले।
यदि इनमें से आपको अंतिम विकल्प पसंद आ रहा है, तो आप संविधान, क़ानून, व्यवस्था के ज्यादा नज़दीक हैं। यदि वास्तव में आपका उत्तर यही है,तो अपनी जानकारी में इतना इजाफा और कर लें, कि "ऐसा करने में कितना समय लगेगा, कितना पैसा लगेगा, मारने वाले को ही सज़ा होगी, कुछ इनाम लेकर मारने वाला, मरने वाला, देखने वाला, बचने वाला सबके बदल दिए जाने आदि, किसी बात की कोई गारंटी नहीं होगी।"
जब खंडहर-जर्जर हो जाने पर पुराने भवन तोड़ कर या छोड़ कर नए भवन बनाए जा सकते हैं, पुराने लोग बूढ़े हो जाने पर उनकी जगह नए नियुक्त हो सकते हैं, तो पुराने कानूनों को बदलने में क्या बाधा हो सकती है?
हमारा क़ानून कातिल के सारे हित और अधिकार सोच लेता है, किन्तु जो मरा, उसके हितों को सोचने की चिंता नहीं करता। क्या यह "न्याय" है?
हम कितने सगे न्याय के हैं, और कितने अन्याय के?
1.उस से डर कर सब छिप जाएँ, कि वह औरों को भी मार देगा।
2.उसे भी मार दिया जाए, और मारने की प्रक्रिया ऐसी अपनाई जाए कि उसे देख कर कोई अपने होश-हवास में किसी और को मारने के बारे में भूल कर भी न सोचे।
3.मारने वाला उसके परिजनों को कुछ रूपये का मुआवजा दे, जिसे उसने मार दिया है।
4.सब मिलकर मरने वाले के परिवार को ढाढ़स बंधाएं।
5.मारने वाले को पकड़ कर सीमित भोजन देते हुए ऐसी कोठरी में बंद कर दिया जाए, जहाँ उसके ह्रदय में पश्चाताप और ह्रदय परिवर्तन की संभावना जन्म ले।
यदि इनमें से आपको अंतिम विकल्प पसंद आ रहा है, तो आप संविधान, क़ानून, व्यवस्था के ज्यादा नज़दीक हैं। यदि वास्तव में आपका उत्तर यही है,तो अपनी जानकारी में इतना इजाफा और कर लें, कि "ऐसा करने में कितना समय लगेगा, कितना पैसा लगेगा, मारने वाले को ही सज़ा होगी, कुछ इनाम लेकर मारने वाला, मरने वाला, देखने वाला, बचने वाला सबके बदल दिए जाने आदि, किसी बात की कोई गारंटी नहीं होगी।"
जब खंडहर-जर्जर हो जाने पर पुराने भवन तोड़ कर या छोड़ कर नए भवन बनाए जा सकते हैं, पुराने लोग बूढ़े हो जाने पर उनकी जगह नए नियुक्त हो सकते हैं, तो पुराने कानूनों को बदलने में क्या बाधा हो सकती है?
हमारा क़ानून कातिल के सारे हित और अधिकार सोच लेता है, किन्तु जो मरा, उसके हितों को सोचने की चिंता नहीं करता। क्या यह "न्याय" है?
हम कितने सगे न्याय के हैं, और कितने अन्याय के?
Thursday, December 20, 2012
बुरा और अच्छा होने में काफी समानता है
यदि वास्तव में कल, अर्थात 21 दिसम्बर 2012 को सब कुछ समाप्त हो रहा है, तो भी हमारी आशाएं समाप्त नहीं हो जातीं। जो कुछ होगा वह हो, कोई इसमें क्या कर सकता है? लेकिन फिर भी, यदि सब कुछ ख़त्म होने के बाद, कभी दोबारा दुनिया आरम्भ होती है, तो उसमें कम से कम ऐसा तो न हो-
1,यदि कोई भी, कहीं भी,किसी भी कष्ट में हो, तो कोई भी ख़ुशी न मना रहा हो।
2.कोई भी किसी की मृत्यु, या प्राण-घातक आक्रमण का कारण न बने।
3.कोई भी अपने को किसी भी दूसरे से ज्यादा महत्वपूर्ण या प्रिय न समझे।
4. नई दुनिया में इतनी गणित सबको आती हो, कि वह संसार में किसी भी चीज़ का अपना हिस्सा जान सके, और उस से कण भर भी अधिक लेना स्वीकार न करे।
मुझे लगता है कि हम में से 90 प्रतिशत लोग यह सोचने लगे हैं कि यदि नई दुनिया में ऐसा ही नीरस, उबाऊ,बोझल जीवन हो, तो इस से अच्छा है कि दुनिया दोबारा बने ही नहीं।
दुनिया तो ऐसी ही होनी चाहिए, जिसमें हम मन-मर्ज़ी से साम-दाम-दंड-भेद कमा सकें। दूसरे कैसे भी कष्ट में हों , हम तो मौज मना सकें, दूसरे चाहे भूखे मरें, हमारे भण्डार सदा भरे रहें, अपने सुखके लिए दूसरों का क़त्ल भी करना पड़े तो हमें कोई ऐतराज़ न हो।
लेकिन सोचिये, यदि ऐसी ही दुनिया दोबारा बनानी हो, तो इसी को क्यों न रहने दिया जाए। ईश्वर भी बिना बात के परिवर्तन की ज़हमत क्यों उठाएगा? इसलिए आशा यही है कि कल कुछ नहीं होगा।हम और हमारी दुनिया, ऐसे ही रहेंगे, बदस्तूर!
1,यदि कोई भी, कहीं भी,किसी भी कष्ट में हो, तो कोई भी ख़ुशी न मना रहा हो।
2.कोई भी किसी की मृत्यु, या प्राण-घातक आक्रमण का कारण न बने।
3.कोई भी अपने को किसी भी दूसरे से ज्यादा महत्वपूर्ण या प्रिय न समझे।
4. नई दुनिया में इतनी गणित सबको आती हो, कि वह संसार में किसी भी चीज़ का अपना हिस्सा जान सके, और उस से कण भर भी अधिक लेना स्वीकार न करे।
मुझे लगता है कि हम में से 90 प्रतिशत लोग यह सोचने लगे हैं कि यदि नई दुनिया में ऐसा ही नीरस, उबाऊ,बोझल जीवन हो, तो इस से अच्छा है कि दुनिया दोबारा बने ही नहीं।
दुनिया तो ऐसी ही होनी चाहिए, जिसमें हम मन-मर्ज़ी से साम-दाम-दंड-भेद कमा सकें। दूसरे कैसे भी कष्ट में हों , हम तो मौज मना सकें, दूसरे चाहे भूखे मरें, हमारे भण्डार सदा भरे रहें, अपने सुखके लिए दूसरों का क़त्ल भी करना पड़े तो हमें कोई ऐतराज़ न हो।
लेकिन सोचिये, यदि ऐसी ही दुनिया दोबारा बनानी हो, तो इसी को क्यों न रहने दिया जाए। ईश्वर भी बिना बात के परिवर्तन की ज़हमत क्यों उठाएगा? इसलिए आशा यही है कि कल कुछ नहीं होगा।हम और हमारी दुनिया, ऐसे ही रहेंगे, बदस्तूर!
Wednesday, December 19, 2012
उगती प्यास दिवंगत पानी
मैंने एक बार आपसे कहा था कि किसी भी लेखक को हर उस विधा में लिखना चाहिए, जिसमें वह लिखना चाहे। मैंने भी उपन्यास, कहानी, कविता, निबन्ध, संस्मरण, लघुकथा, नाटक, क्षणिका, ग़ज़ल, गीत, व्यंग्य, समीक्षा, दोहे, छंद, यहाँ तक कि "शब्दावली" भी, सब लिखा।
किन्तु प्रकाशकों-संपादकों ने मेरी "कविता" को थोड़ा उदासीनता से छापा। आप यह जानना चाहेंगे, कि मुझे इस 'उदासीनता' की पहचान कैसे हुई? छाप तो दिया ही न ?
मैं बताता हूँ। मैं जब भी किसी अखबार या पत्रिका को कोई कविता भेजता था, तो वह छप तो जाती थी, किन्तु वे मुझे कई बार लिखते थे, कि अब कोई ताज़ा कहानी भेजिए। बहरहाल, जब भी कहानी भेजी, कभी किसी ने यह नहीं कहा कि अब कविता भेजिए। बल्कि कई बार तो ऐसा भी हो गया, कि कुछ न भेजा,तो मित्र-संपादकों ने लिखा कि कविता 'ही भेज दीजिये'। अब बताइये, समझदार को इशारा ही काफी है या नहीं?
इस तरह मेरी कुछ[ सब नहीं] कवितायेँ मेरे पास थीं। तभी मैंने एक युवा ब्लॉगर "मन्टू कुमार" के ब्लॉग पर कुछ कवितायें पढ़ीं। मुझे दाल में कुछ काला लगा। मतलब यह, कि ब्लॉगर तो किशोर वय का, लेकिन कवितायें प्रौढ़। सच कहूं, मुझे लगा कि या तो कोई मझा हुआ लेखक पुरानी फोटो के साथ लिख रहा है,या किसी बच्चे के हाथ कोई डायरी लग गयी है।
संयोग देखिये, कुछ ही दिनों में मन्टू से मेरा प्रत्यक्ष मिलना हो गया। उसने मेरी शंका का निवारण मुस्कराते हुए किया, और मेरी ही मेज़ पर बैठ कर कुछ ताज़ा कवितायें लिख कर मुझे दीं।
उसकी और मेरी आयु में लगभग चालीस वर्ष का अंतर है। पर हम दोनों अपनी कुछ कवितायें जल्दी ही आपको पढवा रहे हैं।
किन्तु प्रकाशकों-संपादकों ने मेरी "कविता" को थोड़ा उदासीनता से छापा। आप यह जानना चाहेंगे, कि मुझे इस 'उदासीनता' की पहचान कैसे हुई? छाप तो दिया ही न ?
मैं बताता हूँ। मैं जब भी किसी अखबार या पत्रिका को कोई कविता भेजता था, तो वह छप तो जाती थी, किन्तु वे मुझे कई बार लिखते थे, कि अब कोई ताज़ा कहानी भेजिए। बहरहाल, जब भी कहानी भेजी, कभी किसी ने यह नहीं कहा कि अब कविता भेजिए। बल्कि कई बार तो ऐसा भी हो गया, कि कुछ न भेजा,तो मित्र-संपादकों ने लिखा कि कविता 'ही भेज दीजिये'। अब बताइये, समझदार को इशारा ही काफी है या नहीं?
इस तरह मेरी कुछ[ सब नहीं] कवितायेँ मेरे पास थीं। तभी मैंने एक युवा ब्लॉगर "मन्टू कुमार" के ब्लॉग पर कुछ कवितायें पढ़ीं। मुझे दाल में कुछ काला लगा। मतलब यह, कि ब्लॉगर तो किशोर वय का, लेकिन कवितायें प्रौढ़। सच कहूं, मुझे लगा कि या तो कोई मझा हुआ लेखक पुरानी फोटो के साथ लिख रहा है,या किसी बच्चे के हाथ कोई डायरी लग गयी है।
संयोग देखिये, कुछ ही दिनों में मन्टू से मेरा प्रत्यक्ष मिलना हो गया। उसने मेरी शंका का निवारण मुस्कराते हुए किया, और मेरी ही मेज़ पर बैठ कर कुछ ताज़ा कवितायें लिख कर मुझे दीं।
उसकी और मेरी आयु में लगभग चालीस वर्ष का अंतर है। पर हम दोनों अपनी कुछ कवितायें जल्दी ही आपको पढवा रहे हैं।
Subscribe to:
Posts (Atom)
मैं जानता हूं कि...
उड़ान और सामाजिकता का संबंध बेहद दिलचस्प है। आप जितना ऊपर उड़ते जाते हैं समाज नीचे उतना ही आपसे दूर होता जाता है। ये बात शायद उस परिंदे के ...
Lokpriy ...
-
1. Abdul Bismillah 2. Abhimanyu Anat 3. Ajit Kumar 4. Alok Puranik 5. Amrit lal Vegad 6. Anjana Sandheer 7. Anurag Sharma"Smart ...
-
जिस तरह कुछ समय बाद अपने रहने की जगह की साफ़ सफाई की जाती है, वैसे ही अब यह भी ज़रूरी हो गया है कि हम अपने समय के शब्दकोषों की सफाई करें. ब...
-
जयपुर के ज्योति विद्यापीठ महिला विश्व विद्यालय की प्रथम वाइस-चांसलर,देश की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक-शिक्षाविद प्रोफ़ेसर रेखा गोविल को "शिक्...
-
निसंदेह यदि कुत्ता सुस्त होगा तो लोमड़ी क्या,बिल्ली भी उस पर झपट्टा मार देगी। आलसी कुत्ते से चिड़िया भी नहीं डरती, लोमड़ी की तो बात ही क्या...
-
जब कोई किसी भी बात में सफल होता है तो उसकी कहानी उसकी "सक्सेज़ स्टोरी" के रूप में प्रचलित हो जाती है। लेकिन यदि कोई अपने मकसद...
-
धरा खिलखिला कर हंस पड़ी। लड़के ने बेहद संकोच से चोली धरा को पकड़ाई। धरा को ये देखना सुहा रहा था कि ज़मीन केवल उसकी ही डाँवाडोल नहीं हो रही है...
-
मैं हमेशा से इस बात का कायल रहा हूँ कि लिखने वालों को अपने दिल की बात लिखनी चाहिए, इस बात पर नहीं जाना चाहिए कि इसे कौन पढ़ेगा,पढ़ कर क्या ...
-
"राही रैंकिंग -2015" हिंदी के 100 वर्तमान बड़े रचनाकार रैंक / नाम 1. मैत्रेयी पुष्पा 2. नरेंद्र कोहली 3. कृष्णा सोबती 4....
-
इस कशमकश से लगभग हर युवा कभी न कभी गुज़रता है कि वह अपने कैरियर के लिए निजी क्षेत्र को चुने, या सार्वजनिक। मतलब नौकरी प्राइवेट हो या सरकारी।...