Friday, December 21, 2012

हम कितने किसके हैं?

यदि कोई किसी को मार देता है, तो सबके पास ये विकल्प हैं-
1.उस से डर कर सब छिप जाएँ, कि  वह औरों को भी मार देगा।
2.उसे भी मार दिया जाए, और मारने की प्रक्रिया ऐसी अपनाई जाए कि  उसे देख कर कोई अपने होश-हवास में किसी और को मारने के बारे में भूल कर भी न सोचे। 
3.मारने वाला उसके परिजनों को कुछ रूपये का मुआवजा दे, जिसे उसने मार दिया है।
4.सब मिलकर मरने वाले के परिवार को ढाढ़स बंधाएं।
5.मारने वाले को पकड़ कर सीमित भोजन देते हुए ऐसी कोठरी में बंद कर दिया जाए, जहाँ उसके ह्रदय में पश्चाताप और ह्रदय परिवर्तन की संभावना जन्म ले।
यदि इनमें से आपको अंतिम विकल्प पसंद आ रहा है, तो आप संविधान, क़ानून, व्यवस्था के ज्यादा नज़दीक हैं। यदि वास्तव में आपका उत्तर यही है,तो अपनी जानकारी में इतना इजाफा और कर लें, कि  "ऐसा करने में कितना समय लगेगा, कितना पैसा लगेगा, मारने वाले को ही सज़ा होगी, कुछ इनाम लेकर मारने वाला, मरने वाला, देखने वाला, बचने वाला सबके बदल दिए जाने आदि, किसी बात की कोई गारंटी नहीं होगी।"
जब खंडहर-जर्जर हो जाने पर पुराने भवन तोड़ कर या छोड़ कर नए भवन बनाए जा सकते हैं, पुराने लोग बूढ़े हो जाने पर उनकी जगह नए नियुक्त हो सकते हैं, तो पुराने कानूनों को बदलने में क्या बाधा हो सकती है?
हमारा क़ानून कातिल के सारे हित और अधिकार सोच लेता है, किन्तु जो मरा, उसके हितों को सोचने की चिंता नहीं करता। क्या यह "न्याय" है?
हम कितने सगे न्याय के हैं, और कितने अन्याय के?

1 comment:

  1. सच में ये सवाल बहुत सोचने पर मजबूर करता है। कानून हमेशा कातिल के अधिकार और प्रक्रिया पर ध्यान देता है, पर मरने वाले के नुकसान या उसके परिवार के दर्द पर कम ध्यान देता है। हम अक्सर यही सोचते हैं कि न्याय मिल गया, पर असल में कई बार केवल कागजी कार्रवाई होती है। अगर हम वास्तव में न्याय चाहते हैं, तो समाज को मारने वाले को सुधारने और मरने वाले के परिवार को सहारा देने पर भी ध्यान देना होगा।

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