Wednesday, May 21, 2014

जैसे सब अपराधी जेल में नहीं होते, वैसे ही जेल में बंद सब लोग अपराधी नहीं होते

 "निष्कर्ष" निकालना एक कला है। यह एक विज्ञान भी है। थोड़ा और आगे चलें, तो यह वाणिज्य भी है, अर्थात व्यापार।यह क़ानून तो है ही, यह पत्रकारिता भी है।
देश में अभी-अभी एक घटना घटी। आम चुनाव हुए, और पिछली सरकार की जगह एक नई सरकार आ गई।सब कुछ गणित की तरह साफ़ है कि किसे कितने वोट मिले, किसे कितनी सीटें मिलीं, फिर भी लोगों के निष्कर्ष अलग-अलग हैं- कोई कह रहा है, अच्छा हुआ, कोई कह रहा है ठीक नहीं हुआ।
आप चाहें तो आप भी कई निष्कर्ष निकाल सकते हैं, जैसे-
-हम जिस रंग का चश्मा पहने बैठे हैं, हमें सब उसी रंग का दिखेगा।
-हमारे पास खूब "रिच" शब्दावली है, हम किसी को भी पूज सकते हैं, किसी को भी कोस सकते हैं।
-हम इंसानों के परिचय-पत्र पर जानवरों की फोटो भी चिपका सकते हैं, उदाहरण के लिए "बाढ़ का पानी आता है तो सांप-बिच्छू एक जगह बैठ जाते हैं-राम विलास पासवान।"
            

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