Sunday, June 29, 2014

कुत्ता,तोता और मछली

उमस भरी दोपहर थी। तालाब के किनारे आम के पेड़ पर एक तोता बैठा कच्चे आम को कुतर रहा था। आम का एक छोटा सा टुकड़ा उसकी चोंच से नीचे गिरा। पेड़ के नीचे उनींदे से बैठे कुत्ते ने उस टुकङे को लपक लिया। कुत्ते को जैसे ही टुकड़े का खट्टा स्वाद आया उसने झट उछाल कर टुकड़ा तालाब की ओर फेंका जंहा उसे एक तैरती हुई मछली ने पकड़ लिया।
मछली उसे ज्यादा देर चूसती न रह सकी। उसके खट्टे-तीखे स्वाद के चलते मछली ने भी उसे झट से पानी में उगल दिया, जहां से वह फिर मिट्टी में जा मिला।
मिट्टी ने उसे देखते ही डाँटना शुरू किया-"क्यों रे अभागे, मैंने तेरी माँ की महीनों तक देखभाल करके, उसे उगाकर पेड़ बनाया, जिस पर तूने जन्म लिया। और तू किसी के काम न आकर उछलता-कूदता फ़िर मेरे पास चला आया?"
टुकड़ा बोला-"मैं क्या करूँ, मैं तो तोता, कुत्ता,मछली तीनों के मुंह में गया, पर तीनों ने ही मेरा अपमान करके वापस फेंक दिया।"
धरती कुपित होकर बोली-"अच्छा, उन स्वाद के दीवानों की ये मज़ाल, तुझे फेंक दिया? मैं तीनों को सजा दूँगी। आज से इन तीनों को कैद में रहना होगा।"
-"हमेशा?" टुकड़े ने चकित होकर पूछा।
-"अरे नहीं रे, इतनी सी बात के लिए उम्र-क़ैद थोड़े ही होती है! इन्हें हल्का-फुल्का कारावास मिलेगा।" धरती बोली।
उस दिन से आदमी का जब भी किसी को पालतू बनाने का दिल करता, वह प्राणियों में से कुत्ते के गले में पट्टा डालता,पंछियों में से तोते को पिंजरे में डालता,और जलचरों में से मछली को काँचघर में बंद कर के अपने घर ले आता। फिर इन्हें वही खाना मिलता जो आदमी खिलाता।
आदमी की क़ैद में सबसे ज्यादा यही तीनों देखे जाते।         
                          

Saturday, June 28, 2014

कोई अच्छा सा नाम तलाश कीजिये "स्टार" के लिए

हम फिल्म कलाकारों को "स्टार" कहते हैं।  स्टार माने सितारा, तारा, नक्षत्र, उल्का,ग्रह।
हम अब तक फिल्म कलाकारों को भी सितारा कहते आए हैं।
स्टार या सितारा हम उन्हेँ इसलिए कहते हैं क्योंकि वे अमूमन हमें केवल परदे पर ही दिखते रहे हैं, हक़ीक़त में उन्हें देखना या उनसे मिलना बहुत मुश्किल होता है। वे पब्लिक से बचते या छिपते रहे हैँ, और पब्लिक उनके कहीं होने की भनक मिलते ही उन्हें देखने दौड़ती रही है।
लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब वे खुद लोगों के बीच आते हैं, अपने होने का विज्ञापन और प्रचार करते हैं। यहाँ तक कि अपनी फिल्म के बारे में लोगों के बीच हवा बनाने के लिए वे शहर-शहर प्रमोशन करते घूमते हैं।  कभी पोस्टर, कभी ट्रेलर तो कभी संगीत जारी करते हैं। बड़े रिलीज़ पर तो प्रेस कॉन्फ़्रेंस करने तक से नहीं चूकते, लोकप्रिय टीवी कार्यक्रमों के सेट पर जाते हैं, ताकि उस कार्यक्रम को देखने आई पब्लिक उन्हें देख ले।
ऐसे छल-छद्म से अपना चेहरा येन-केन-प्रकारेण लोगों को दिखा देना क्या उन्हेँ 'स्टार' स्टेटस देने लायक छोड़ता है? आप खुद फैसला कीजिये।  यदि आपको लगता है कि  इस तरह अपनी शक़्ल की मार्केटिंग करने वाले 'स्टार' कहने योग्य नहीं हैं, तो फिर इनके लिए कोई नया विशेषण या नाम सोचिये।                  

Thursday, June 26, 2014

क्या और कुछ नहीं करता?

ये एक बहुत पुराना लतीफ़ा है कि "कवि" युवक को जब विवाह के लिए लड़की वाले देखने आए तो उन्होंने वही चिरपरिचित सवाल किया- "लड़का क्या करता है?"
यह बताने पर कि वह कवि है, लड़की वालों ने कहा, तो क्या कविता लिखने के अलावा और कुछ भी नहीं करता?
लड़के की माँ ने तिलमिला कर जवाब दिया-"करता कैसे नहीं है जी, कविता लिखने के बाद सब से सुनने के लिए मिन्नतें करता है। जेबखर्च से बचा-बचा कर किताब के लिए कागज़ लाता है, टाइपिंग,प्रूफ़ रीडिंग,प्रिंटिंग, डिज़ाइनिंग,बाइंडिंग करता है, बेचता है, बाँटता है,कवि सम्मेलन करवाता है.…
लड़की ने सब सुनते ही तुरंत कहा -"मैं शादी के लिए तैयार हूँ, बस एक शर्त है, ये बाक़ी सब करें, बस कविता लिखना छोड़ दें, अपनी कविता की जगह दूसरों की कविता के लिए ये सब करेंगे तो इनकी कमाई से घर का ख़र्च आराम से चल जायेगा।"
लड़के और उसकी माँ को लड़की के समझदार, गुणवती और सुशील होने में कोइ संदेह न रहा।                

Wednesday, June 25, 2014

महँगाई तब घट जाएगी

देश और दुनिया का अर्थशास्त्र महँगाई बढ़ने के कारण और उसे रोकने के उपाय अपने-अपने तरीके से बताता है, लेकिन महँगाई तो उन सबके लिए भी होती है जिनका अर्थशास्त्र से कोई लेना-देना नहीं।  और मज़े की बात ये है कि महँगाई कम करने के कुछ उपाय आपके अपने पास भी हैँ, जैसे-
*आपको जो चीज़ नहीं चाहिए, उसे मत खरीदिए।  इससे बाजार में उसकी कीमत कम होगी क्योंकि उसकी मांग घट जाएगी।
*यदि आपके पास कुछ ऐसा है जिसे न तो आप काम में ले रहे हैँ, और न कभी लेंगे,उसे किसी ऐसे व्यक्ति को दे दीजिये, जिसे सचमुच वह चाहिए।
*न खराब होने वाली चीज़ें ज़रूरत से थोड़ी ज़्यादा खरीदिए, ताकि कुछ समय बाद जब वे महँगी हो जाएँ, तब आप उन्हें कम दर पर इस्तेमाल कर रहे होंगे।
*यदि आप नक़ल करने के शौक़ीन हैं, तो उनकी नक़ल कीजिये जो बहुत व्यस्त रहते हैं।
एक बात हमेशा ध्यान रखिये, दुनिया में ऐसा कोई नहीं है, जिसका अर्थशास्त्र से लेना-देना न हो। यह भी जान लें कि  उपर्युक्त सभी उपाय अल्पकालिक हैं।  इन्हें लम्बे समय तक नहीं चलाया जा सकता।               

Monday, June 23, 2014

कड़क नोट कजरारे कारे

कर की चोरी करत-करत भये
धन की बोरी भरत-भरत भये
कड़क नोट कजरारे कारे !
जा के बदरा बैरी ला रे
स्विस के ताले खोल के ला रे
थोड़े-थोड़े तोल के ला रे
गुपचुप ला या बोल के ला रे
कड़क नोट कजरारे कारे !
जनता का धन चरत-चरत भये
माल तिजोरी धरत-धरत भये
कड़क नोट कजरारे कारे !
श्याम-श्याम धन वापस ला रे
या मालिक का नाम बता रे
क्यों परदेस छिपा आया रे
क्या स्वदेश से हुई खता रे    
कड़क नोट कजरारे कारे !        

Saturday, June 21, 2014

और खरगोश फिर हार गया कछुए से

खरगोश सुबह-सुबह तालाब के किनारे टहलने जा रहा था।  रास्ते में एक खेत से ताज़ा गाजर तोड़ कर वह उसे पानी से धो ही रहा था, कि इठलाती हुई एक बतख वहां आ गई।  दोनों में दोस्ती हो गयी।  बतख बोली- "लाओ, तुम्हारी गाजर का हलवा बना दूँ।"
हलवा तैयार हुआ तो बतख बोली- "जाओ, जल्दी से मुंह धोकर आओ, फिर हलवा खाना।"
खरगोश जब मुंह धोकर आया तो उसने बतख की केसरिया चोंच को देख कर मन ही मन सोचा, इसने ज़रूर पीछे से हलवा खाया है।
उसने तालाब के थाने में जाकर चोरी की रपट लिखा दी।  थानेदार मेंढक बतख को गिरफ्तार करने चला आया। जब वह बतख को पकड़ने लगा तो बतख ने कहा-"तुम्हारे पास क्या सबूत है कि  मैंने हलवा खाया है?"
खरगोश बोला-"तुम्हारी चोंच और पंजे हलवे से लाल हो गए हैं !"
बतख घबरा कर बोली-"मैंने हलवा नहीं खाया, मेरी चोंच और पंजे तो इसी रंग के हैं।"  
शोर सुन कर तालाब से कछुआ निकल आया।  जब उसे सारी बात का पता चला तो वह फ़ौरन बोल पड़ा-"थानेदार जी,मैं एक खेत से कपास लाया था, उसका मैंने नर्म सफ़ेद कोट सिलवाया था, जो चोरी हो गया।  लगता है इस खरगोश ने वही कोट पहना है,गिरफ़्तार कर लीजिये इसे।"
खरगोश के यह सुनते ही होश उड़ गए। हक्का-बक्का होकर बोला-"मैंने कोट नहीं पहना, मेरा रंग तो सफ़ेद ही है।"
कछुआ बोला -"कुछ भी हो, अब तुम पर बतख की मानहानि का मुकदमा चलेगा। चलो मेरे साथ।"
खरगोश ने तुरंत सभी से माफ़ी मांगी, और बोला-"कछुए भैया ने आज मुझे दूसरी बार हराया है।"

    
        

Wednesday, June 18, 2014

क्या आप भी आदतों के आदी हैं?

यदि कोई आपसे कहे कि आप आठ बजे खाने पर आइये।
कोई आपसे कहे कि फिल्म आठ बजे शुरू होगी, देखने आइये।
कोई आपसे कहे कि  आपकी परीक्षा आठ बजे से है।
कोई आपसे कहे कि मुख्यमंत्री आठ बजे आ रहे हैं, उनकी सभा में आइये।
कोई आपसे कहे कि  आपकी गाड़ी का डिपार्चर टाइम आठ बजे है।
इन प्रश्नों का उत्तर क्या है? क्या आप इन पाँचों जगह ठीक आठ बजे पहुँच जाएंगे?
शायद नहीं।  इनमें से कुछ जगह आप शायद साढ़े सात बजे ही पहुँच जाएँ, और हो सकता है कहीं आपको पहुँचते-पहुँचते दस भी बज जाएँ।
तो ये कौन तय करता है कि  हमें किसकी बात को कितनी गंभीरता से लेना है?
हम खुद।  और इसके लिए हम सब के पास एक दिमाग है, जो हमारे ये विभेद तय करता है कि हम किस बात से कितना हट सकते हैं।
हम सब के पास एक अदृश्य रस्सी भी है जो हम ऐसे समय दिमाग़ को दे देते हैं,दिमाग़ चाहे तो इस रस्सी से हमें उस बात से बाँध दे और चाहे तो एक सिरा हमसे बाँध कर दूसरा सिरा ढीला छोड़ दे।  यह ढील जितनी होगी, हम उस बात से उतना ही हट पाएंगे।
इसे हम "आदत" कहते हैं ।        

मैं जानता हूं कि...

 उड़ान और सामाजिकता का संबंध बेहद दिलचस्प है। आप जितना ऊपर उड़ते जाते हैं समाज नीचे उतना ही आपसे दूर होता जाता है। ये बात शायद उस परिंदे के ...

Lokpriy ...