Sunday, August 17, 2014

आभासी तारतम्य

कभी-कभी महिलाएं इसे "निगरानी" भी समझ लेती हैं, किन्तु वस्तुतः यह निगरानी से ज्यादा "हिफाज़त"का भाव है, जिसके तहत घर से बाहर जाने वाली लड़की-महिला से घरवाले आभासी संपर्क बनाये रखना चाहते हैं।  "कॉलेज तो पांच बजे छूट गया था, अब सात बजे हैं" या "कहीं जाना था तो फोन क्यों नहीं किया? और "जाना क्यों था?" आदि जुमलों में प्रथम दृष्टया कड़े अनुशासन का भाव दिखाई देता है, किन्तु यह रोक-टोक  से ज्यादा 'चिंता' की अभिव्यक्ति है। निश्चित ही कुछ महिलाएं इसे चिंता से ज्यादा "चाय-खाने के लिए प्रतीक्षा रत पुरुषों की उतावली भरी प्रतीक्षा" भी मानती हैं, जो कि कभी-कभी ये होती भी है।
लड़कों के साथ ये नहीं होता। कॉलेज पांच बजे छूटा तो रात ग्यारह बजे तक कहाँ थे-साथ में कौन-कौन था- क्या कर रहे थे- फोन क्यों नहीं किया?,यह सब लड़कों से नहीं पूछा जाता।
इस लापरवाही के चलते कहीं कोई ऊँच-नीच हो जाती है, तो पहले मनमोहन जिम्मेदार थे, अब मोदी जी हैं।
लोकतंत्र ऐसे नहीं चलते।  बच्चे सालभर पहले पढ़ते हैं, फिर जाकर तीन घंटे का इम्तहान देते हैं। सरकारों से दो-बात पूछने से पहले अपना-अपना साक्षात्कार सब कर लें तो शायद समस्याएं आधी रह जाएँ।
लेकिन ये किसी भी दृष्टि से सरकार या प्रशासन को क्लीनचिट या रिबेट देना नहीं है, केवल उसके काम में जन-सहयोग का आह्वान !   
   

Friday, August 15, 2014

अधूरे जुमले

जरुरी नहीं, कि महान लोगों की हर बात महान ही हो।  कई बार वो ऐसी बात कर जाते हैं कि आपको झुंझलाहट होने लगे।
अब देखिये- गांधीजी ये तो कह गए कि यदि कोई तुम्हारे एक गाल पर चाँटा मार दे तो दूसरा भी उसके आगे कर दो, पर यह बता कर नहीं गए कि यदि वह दूसरे गाल पर भी चाँटा मार दे तो क्या करना है।
इसी तरह महाकवि कबीर ने यह फ़रमान तो जारी कर दिया कि निंदक नियरे राखिये, पर यह नहीं बता कर गए कि यदि चारों तरफ निंदक ही निंदक जमा हो जाएँ तो क्या करें।
एक राजा अपने राज को ठीक से संभाल नहीं पा रहा था, तो जनता ने ज़ोर लगा कर उसका तख्ता पलट दिया। दूसरा राजा आ गया।
पहले राजा ने सोचा, चलो अब विश्राम ही कर लें,किन्तु राजा के दरबारियों के सामने समस्या आ गई कि अब क्या करें। कुछ करके थके तो थे नहीं, सो विश्राम क्या करते।  उन्हें कुछ बुद्धिवानों ने समझाया- अरे, पहले स्तुति करते थे तो अब निंदा करो।
दरबारी बोले-लेकिन यदि नया राजा कोई गलती नहीं करे तो?
बुद्धिवानों ने समझाया-अरे मूर्खो, कुछ पढ़े-लिखे हो या नहीं? राजा बोले तो कहना-"देखो, ऑक्सीजन भीतर ले रहा है, और कार्बन डाई ऑक्साइड बाहर छोड़ रहा है।
एक दरबारी बोल पड़ा- और यदि वह चुप रहे तो?
बुद्धिवान ने कहा-तब कहना -"ये भी पहले वाले राजा जैसा, ये भी पहले वाले राजा जैसा!"        

Wednesday, August 6, 2014

प्राण निकल गए

ऐसा बहुत ही कम होता है जब आपकी खींची लकीर आपसे बड़ी हो जाये।  मक़बूल फ़िदा हुसैन की सबसे मशहूर पेंटिंग के सामने खड़े होकर भी आप दांतों तले अंगुली तभी दबाते हैं, जब आपको बताया जाये कि ये हुसैन साहब का शाहकार है।
लेकिन दुनिया भर के करोड़ों बच्चे जब साबू और चाचा चौधरी को देखते हैं तो उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं होती कि इनके "चाचा" कौन हैं ? अर्थात इन्हें किसने बनाया है।
ऐसा करिश्मा तभी हो पाता है जब रचने वाले ने रचना में प्राण भरे हों।
हम-आप भले ही यह सोच कर उदास हो लें कि प्राण अब नहीं रहे, बच्चे तो उदास हो ही नहीं सकते, जब तक उनके बिल्लू,चाची,साबू और चाचा चौधरी उनके साथ हों। और वे हमेशा रहेंगे। उनके प्राण कभी नहीं निकल सकते।
शायद प्राण को मालूम था कि किसी के दिल से बचपन कभी नहीं जाता।  इसीलिए उन्होंने बचपन के इर्द-गिर्द लकीरें खींचीं।
मैं जब रज़िया सुल्तान फिल्म देख रहा था, तो अपने मन में सोच रहा था कि हेमा मालिनी [रज़िया] कभी किसी मुसीबत में नहीं पड़ सकती, क्योंकि उसके साथ उसका "साबू" है।          

Tuesday, August 5, 2014

पहिये का खून

वो हज़ारों सालों तक धरती के भीतर पड़ा सड़ता रहा, मगर किसी ने भी उस पर ध्यान न दिया।  बल्कि धरती पर जो कुछ भी अवांछित, बेकार, और मैला होता वो सब जाकर उसी में मिल जाता। उसकी न किसी को ज़रुरत होती, और न याद ही आती।
इंसान तब अपने पैरों से चलता था। और पैरों में खून होता था। तो उसकी क्या ज़रुरत?
लेकिन पहिये का अविष्कार हो जाने के बाद इंसान को अपने पैरों से नापी दूरियाँ छोटी लगने लगीं। इंसान जहाँ अपनी बिसात हो, पैरों से जाता,और उसके आगे पहिये से।
कुछ समय बाद इंसान को लगा, कि पहिये में भी पैरों की मानिंद खून हो, तो और आगे तेज़ी से जाया जा सकता है।और तब धरती के नीचे दबे इस पेट्रोल की उसे याद आई। ये ही पहिये का खून बन गया।
खून सस्ता थोड़े ही होता है? न इंसान का और न पहिये का। लिहाज़ा इसके दाम बढ़ते गए।
अब इसके दाम रोज़ बढ़ते हैं।  कुछ लोग ये ही सोच के खुश होते हैं कि चलो,ये बेतहाशा दुर्लभ और कीमती हो गया तो इंसान दूर के ढोल बजाना छोड़ आसपास की सुधि लेना भी शुरू करेगा।
मगर बहुत से लोग इस बात से चिंतित भी रहते हैं कि पेट्रोल पहुँच से दूर हो गया तो कहीं हम वापस "कुए के मेंढक" न बन जाएँ।                

Sunday, August 3, 2014

साहित्य के अच्छे दिन- एक साक्षात्कार !

जब ये पूछा पार्टी, क्यों हारी ये जंग?
बोलीं सब बतलाऊँगी,लिख दूंगी एक छंद!

कैसे हो गए रोज़-रोज़, घोटाले चहुँ ओर?
बोलीं, कविता में कहूँ, कौन-कौन था चोर!

कौन विरोधी से मिला, कौन आपके साथ?
-ग़ज़ल कहूँगी एक दिन, होगा परदा फ़ाश !

जमाखोर भरते रहे, कौन तिजोरी माल?
-सबका सुनना एक दिन, लघुकथा में हाल!

मँहगाई बढ़ती रही, फूला भ्रष्टाचार !
-रुकिए बनने दीजिये, मुझे कहानीकार

इतना कहिये पॉलिटिक्स, अच्छी या खराब?
-बाबा थोड़ा ठहरिये, पढ़ लेना "किताब" !


Saturday, August 2, 2014

पढ़ा लिखा कलियुग !

लोग करें बदनाम व्यर्थ ही कलियुग को देखो
त्रेता- द्वापर-सतयुग से ये कैसे कम ? देखो !
त्रेता ने उठवाई सीता, रंगे रक्त से हाथ राम ने
द्वापर में हत्या करवाई कंसराज ने कर्म कांड से
हुए फैसले चीरहरण से, जुआ खेलकर राज चले
अब तो बस "किताब" से भैया, लगी-बुझी का खेल चले! 

डॉ राधाकृष्णन,वी वी गिरी और मार्गरेट अल्वा

मुझे याद है, बचपन में एक बार राष्ट्रपति भवन में जाना हुआ तब वहां डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन रहते थे।
हमें बैठा दिया गया, और फिर एक व्यक्ति ने आकर हमारी क्लास ली।  हमें औपचारिकताओं के "डूज़ एंड डोंट्स" समझाए गए।
कुछ देर बाद एक विशाल दरवाजे से राष्ट्रपति महोदय आये,तो ऐसा लगा, मानो कुछ लोगों द्वारा उनका कोई चित्र झांकी की तरह धीमी गति से हमारे बीच लाया गया हो।  कुछ देर के वार्तालाप के बाद मुलाक़ात का पटाक्षेप हो गया।
मन में एक अनजान सा जो भय समा गया था, वह तिरोहित हुआ, और हम बाहर आये।
लगभग ऐसा ही अनुभव कुछ साल बाद उस समय भी हुआ, जब वराहगिरि वेंकटगिरि राष्ट्रपति थे।
आज यह वाक़या इसलिए याद आ गया, क्योंकि राजभवन में राज्यपाल श्रीमती मार्गरेट अल्वा को सुनते हुए कुछ बातों का अंतर मुखर होकर दिमाग में आया।
डॉ राधाकृष्णन को देखकर हमें लगा था कि जैसे हमारे साथ-साथ राष्ट्रपति भवन की औपचारिकताओं से वे भी असहज हैं और चारों ओर फैले बेशकीमती इंफ्रास्ट्रक्चर के तामझाम से संगत बैठाने की मुहिम का तनाव वे भी झेल रहे हैं। ऐसा लगता था जैसे कोई ज़बरदस्त लोक है, जिसमें रहने के योग्य उन्हें, या उसमें घुसने के योग्य हमें, बनना है। वहां हम क्या करेंगे, क्या खाएंगे-पिएंगे, इसका इल्म न हमें है, और न उन्हें।
राज्यपाल महोदया के साथ ऐसा लगा,जैसे हम उनके घर में हैं।  वे हमें जिस तरह बैठाना चाहती हैं, बैठा रही हैं, जो खिलाना चाहती हैं, या हम खाना चाहते हैं,खिला रही हैं, जो ठीक नहीं हो रहा, उस पर टिप्पणी कर रही हैं ।
राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के समय भी वहां परोसे जाने वाले भोजन या अल्पाहार पर उनकी छाप दिखाई देती थी।
यह आलेख महिला-विमर्श के अंतर्गत नहीं है, यह बीतते समय का मूल्यांकन भी नहीं है,यह भावातिरेक में की गई बीते बचपन की स्मृति-खोरी भी नहीं है। पर फिर भी एक बात आपसे संकोच सहित बांटना चाहता हूँ।
बचपन में मैं सोचा करता था कि यदि राष्ट्रपति को खुजाल हुई तो वह कैसे खुजायेंगे, उन्हें छींक आ गई तो वे क्या करेंगे, यदि उन्हें खांसी आई तो डेकोरम का क्या होगा?                      

मैं जानता हूं कि...

 उड़ान और सामाजिकता का संबंध बेहद दिलचस्प है। आप जितना ऊपर उड़ते जाते हैं समाज नीचे उतना ही आपसे दूर होता जाता है। ये बात शायद उस परिंदे के ...

Lokpriy ...