Tuesday, February 12, 2013

सगे भाइयों में लड़ाई

लोग कहते हैं कि  सगे भाइयों में यदि अनबन या झगड़ा हो तो वह बहुत ज़बरदस्त होता है। जब अन्य किसी परिचित-अपरिचित-मित्र या दुश्मन से मनमुटाव होता है, तो वहां काफी बड़ा भाग स्वाभाविक वैमनस्य का होता है, किन्तु जब सामने सगा भाई हो, तो फिर वैमनस्य नहीं, बल्कि सौमनस्य के तीव्र विखंडन की त्वरित प्रक्रिया होती है।
भारत पाकिस्तान ऐसे ही झगड़ते हैं।
आज मेरे दोनों कान भी आपस में ऐसे ही झगड़े। अब क्योंकि दोनों कान मेरे ही थे, तो वे बिलकुल सगे भाइयों जैसे ही तो हुए। आप कहेंगे कि  कान भला कैसे झगड़ सकते हैं? वे दोनों तो बेचारे आपस में एक-दूसरे के पास तक नहीं आ सकते।
लेकिन झगड़ा बिना एक-दूसरे  के पास आये भी तो हो सकता है। ठीक वैसे ही, जैसे दो सगे भाई अपने-अपने आँगन से एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोल लेते हैं।
आज मेरे पास एक फोन आया कि कुछ लोग "वेलेंटाइन डे" मना रहे हैं। मुझे भी उस कार्यक्रम में आने का निमंत्रण दिया गया। मैं मन ही मन खुश हो गया। मैंने सोचा, प्रेम-प्रीत के त्यौहार में जाने में तो बड़ा मज़ा आएगा। लोगों के अभिसार देखने-सुनने को मिलेंगे।
मैं वहां जाने का ख्याली-पुलाव पका ही रहा था कि  एक और फोन आ गया। जिस समय वह फोन आया, मैं कुछ खा रहा था। अतः मैंने वह फोन उलटे हाथ से उठा कर दूसरे कान से लगा लिया। फोन पर कोई कह रहा था कि हम "वेलेंटाइन डे" का विरोध कर रहे हैं। अतः आप भी आ जाइये या फिर हमें इसके विरोध में कुछ अच्छा, दमदार सा लिख कर दे दीजिये।
मेरे दोनों कानों ने अलग-अलग ये दोनों विरोधी स्वर सुने थे, बस, दोनों आपस में लड़ पड़े।उन्होंने जोश में ये भी नहीं सोचा, कि  हम दोनों एक ही चेहरे पर चस्पां हैं। सगे भाइयों की तरह लड़ पड़े।
अब दोनों का साथ देना तो किसी भी तरह संभव नहीं था, अतः मैंने किसका साथ दिया, किसे चुप रहने को कहा, यह मैं कल बताऊंगा।     

Monday, February 11, 2013

जापान और चाइना क्या सोच रहे हैं?

एक शोध ने यह तथ्य निकाले हैं, कि  चाइना सख्ती से अपनी जनसंख्या के नियंत्रण के प्रति चिंतित है। शायद यह पृथ्वी पर जीवन का ऐसा पहला क्षेत्र है, जहाँ दुनिया का नंबर एक देश अपनी उपलब्धि पर हर्षित नहीं है, और इस से निजात पाना चाहता है। जापान भी संख्या नियंत्रण को पूरी संजीदगी से ले रहा है। नतीजा यह है कि  वहां बच्चों और युवाओं की संख्या इस समय वयस्कों या प्रौढ़ों की तुलना में कहीं कम है। लेकिन वहां यह सब किसी विकास के उन्माद में नहीं, बल्कि सहज समझदारी के तहत हो रहा है।
यहाँ एक पेचीदा जिज्ञासा उत्पन्न होती है, कि धरती पर एक उत्पाद के रूप में हम "मनुष्य" को कैसा समझते हैं? यदि इंसान धरती की सबसे चमत्कारिक और महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जैसा कि  कई देशों में कई शोधार्थियों का निष्कर्ष है, तो इसकी संख्या का आधिक्य किसी देश के लिए अवांछनीय कैसे हो सकता है? यदि होता है, तो हम "मौत पर रोना" जैसी प्रथाओं पर पुनर्विचार क्यों नहीं करते?
क्रूरता के लिए क्षमा करें। इस आलेख का प्रयोजन मनुष्य का निरादर करना नहीं है। न ही अन्य देशों की नीति  पर कोई कटाक्ष करना इसका उद्देश्य है, केवल "मनुष्यता" के बेहतर उपयोग का आह्वान ही इस जिज्ञासा में निहित है। 

Saturday, February 9, 2013

पुण्य

जब आप ऐसी खबर पढ़ते हैं, कि प्रकृति अपना तांडव दिखा कर जन-जीवन अस्त-व्यस्त कर रही है तो मन में कुछ सवाल उठते हैं। कहीं बाढ़ ,कहीं अतिवृष्टि, कहीं तूफ़ान,कहीं बर्फ़बारी, कहीं अकाल, तो मन में आता है कि  प्रकृति खुद अपने को तहस-नहस क्यों करना चाहती है? क्या इंसान प्रकृति का हिस्सा नहीं है?
लेकिन कभी ऐसा भी लगता है कि  शायद प्रकृति इंसान से बात करना चाहती है, और इसीलिए वह कुछ कहने इसी तरह आती है।
जब ऊंची-ऊंची पर्वत-श्रृंखलाओं पर बर्फ गिरती है, तभी तो वेगवती नदियों का जन्म होता है। गंगोत्री से बहा पानी संगम पर आकर महा-कुम्भ में करोड़ों श्रद्धालुओं को पुण्य प्रदान कर रहा है। तो प्रकृति जब भी, जहाँ भी इंसान का अभिषेक करने की अभिलाषा से उमड़ पड़ती है, शायद उसके मन में इंसान का कल्याण ही हिलोरें लेता है।
इंसान में हिम्मत, साहस, चुनौती, जिजीविषा, जगाना भी तो प्रकृति का एक दायित्व ही है,तो इंसान को अकर्मण्यता से बचाने का प्रयास प्रकृति क्यों न करे?
क्या यह पुण्य नहीं है?  

अनुशासित और अस्त-व्यस्त चर्या में कोई ज्यादा फर्क नहीं है

एक व्यक्ति व्यवस्थित और अनुशासित रहता है। समय पर खाना , समय पर सोना, समय पर उठना, समय पर आराम करना, समय पर कार्य करना।
दूसरा व्यक्ति लापरवाह और अस्त-व्यस्त है। न सोने का कोई टाइम है, न जागने का। न काम की कोई जवाबदेही, और न दिनचर्या का अता-पता।
दोनों के जीवन, संतुष्टि, उपलब्धियों आदि में जो भी अंतर हो, वह होगा, किन्तु दोनों की भीतरी-दुनिया में कोई विशेष अंतर नहीं होगा।
हाजमोला चाहिए? नहीं पची न बात?
असल में हमारे शरीर का जो खोल है, उसमें दो दीवारें हैं। एक तो बाहरी आवरण, जिस पर बाहर का वायुमंडल, रौशनी, शोर, सहयोग, संवेदना असर डालते हैं, और दूसरा भीतरी आवरण, जिससे हम अपने खून, प्राण, अंगों, अस्थि-मज्जा आदि से जुड़े हैं। मस्तिष्क रेफरी है। दोनों ओर संभालता है।
लापरवाह अस्त-व्यस्त आदमी बाहरी दबावों-लेट हो जाना, मज़ाक उड़ना, डांट  खाना, नुक्सान हो जाना जैसे बाहरी हंटर या चाबुक को सहता है। अनुशासित आदमी तनाव, चिंता, खीज, भय, डिप्रेशन, अपेक्षा जैसे भीतरी दबावों को सहता है।
एक के कपड़े, सामान, बाल,मुद्रा अस्त-व्यस्त होती रहती है, दूसरे के शरीर के रस, एन्जाइम्स, शिराएँ, तंतु, कोशिकाएं अस्त-व्यस्त होते रहते हैं।
दोनों को ही बाद में सब ठीक करने के लिए समय, शक्ति, प्रयास, और इच्छा चाहिए।

Friday, February 8, 2013

समझदारी का काम बच्चों का

"बूढ़ा जब अपने जाने के दिन नज़दीक देखने लगा तो उसने सोचा, अपने बच्चों को ऐसा कुछ सिखा जाऊं, कि  मेरे जाने के बाद ये आपस में लड़ें नहीं, और मिल-जुल के रहें। बहुत सोचने पर उसे वही सीख याद आई, जो कभी उसके पिता ने उसके बचपन में उसे दी थी।
उसने अपने सभी बच्चों को बुला कर एक-एक छोटी लकड़ी की टहनी दी, और कहा, इसे तोड़ो। सभी ने आसानी से उसे तोड़ दिया। फिर बूढ़े ने वैसी ही कुछ लकड़ियों का गट्ठर देकर सभी से उसे तोड़ने को कहा। कोई न तोड़ पाया।
बूढ़े ने खुश होकर कहा- देखो, इन्हीं लकड़ियों की तरह यदि सब एकसाथ मिलकर रहोगे, तो कोई तुम्हें नुक्सान नहीं पहुंचा सकेगा। इस सीख को देने के चंद दिनों बाद बूढ़ा स्वर्ग सिधार गया।"
यह कहानी सुना कर वैताल विक्रम से बोला-"राजन, चंद दिनों बाद चुनाव आ रहे हैं। सरकार से सभी दुखी हैं।अब मौका है कि सब मिलकर उसे हटादें, लेकिन सब अलग-अलग दल बना कर सरकार को ललकार रहे हैं, इस तरह तो ये सब हार जायेंगे। ये बूढ़े की सीख पर अमल क्यों नहीं करते?"
विक्रम ने कहा-" शिक्षाप्रद कहानियां तो बच्चों को सिखाई जाती हैं, लेकिन बच्चे वोटर नहीं होते।"
वैताल ने कहा- "ओह!" इतना कहकर वह फिरसे उसी सरकार के शपथ-ग्रहण समारोह में जाने की तैयारी करने लगा।      
   

Thursday, February 7, 2013

घर वाले अच्छे भी तो हो सकते हैं

एक ज़माना था, जब सचमुच घर वाले अच्छे नहीं होते थे। वे जब अपने बेटे या बेटी का रिश्ता तय करते तो दहेज  मांग लिया करते थे। बेटी के युवा होने से पहले ही उसके हाथ पीले करने की सोचने लगते थे। बेटे का रिश्ता तय करते समय लड़की में मीन-मेख निकालने लगते थे। लड़के लड़की को आपस में बात तक नहीं करने देते थे। और उधर बहू घर में आई नहीं कि सास उससे मोर्चाबंदी में जुट जाती थी।
आखिर इस समस्या का हल लड़का-लड़की ने ही निकाला। वे आपस में एक-दूसरे को देख कर पसंद करने लगे, और इस तरह प्रेमविवाह की शुरुआत हुई। घरवालों का काम केवल मन मसोस कर आशीर्वाद देना ही रह गया।
लेकिन घर वाले हमेशा ऐसे ही नहीं होते।
विश्वसुन्दरी और सुपरस्टार प्रियंका चोपड़ा के घर वालों ने जब देखा कि  बिटिया फिल्मों में इतनी व्यस्त हो गई, कि  उसे प्रेम करने तक का टाइम नहीं मिल रहा, तो उन्होंने उसकी मदद करने का मन बनाया और उसके लिए लड़का ढूंढ दिया। लड़का भी ऐसा, कि  जो भी देखे, "मोहित" हो जाये।
जब लड़की विश्वसुन्दरी हो, तो लड़का भी कम से कम जगत-पिता की भूमिका कर सकने वाला तो हो। सो ऐसा ही हो गया।
जानते हैं, ऐसा सुन्दर-सुशील लड़का किसने ढूंढा? प्रियंका की मौसी ने!
आखिर सगी मौसी हैं, कोई सौतेली माँ ... 

Wednesday, February 6, 2013

फिल्मों में पहले हुआ पर असल जिंदगी में अब होगा

 हमारे फिल्मकारों की कलई धीरे-धीरे खुलती जा रही है। जब उनसे कहा जाता है कि  वह हिंसा और अपराध दिखाते हैं, जिससे समाज में हिंसा और अपराध फैलते हैं, तो वे यह कह कर पल्ला झाड़ लेते हैं कि  हम तो वही दिखाते हैं जो समाज में पहले से हो रहा है। लेकिन अब धीरे-धीरे ऐसी कई बातें हो रही हैं, जो फिल्मों में पहले से ही होती रही हैं।
हमारे आम फ़िल्मी-दर्शक "कुम्भ" के बारे में यही जानते हैं कि  यह एक ऐसा भीड़-भरा मेला होता है जिसमें फिल्मों के जुड़वां भाई या जुड़वां बहनें आपस में बिछड़ जाते हैं।
आज सचमुच कुम्भ की यही फ़िल्मी प्रतिष्ठा दाव पर लगी है। हमारे राजनैतिक अखाड़ों के कई खलीफा "कुम्भ" में डुबकी लगाने जा रहे हैं। देखें, किसे अपने 'बिछड़े' मिलते हैं, और कौन अपनों से 'बिछड़ता है?

मैं जानता हूं कि...

 उड़ान और सामाजिकता का संबंध बेहद दिलचस्प है। आप जितना ऊपर उड़ते जाते हैं समाज नीचे उतना ही आपसे दूर होता जाता है। ये बात शायद उस परिंदे के ...

Lokpriy ...