Sunday, April 8, 2012

सूखी धूप में भीगा रजतपट [ भाग 32 ]

     ये काम आसान न था. रसबाला को मुस्लिम परिवार के लिए गोद लेना आसान न था. कई पेचीदगियां थीं. लेकिन बच्चों के भविष्य को देखते हुए, जब अनाथालय के अधीक्षक ने पाया कि कोई संपन्न महिला बार-बार रसबाला को ले जाने के लिए ही आग्रह कर रही है, तो उन्होंने रूचि लेकर मुस्लिम दंपत्ति की मदद की. थोड़ा हेर-फेर अभिलेख में भी किया गया.और इस तरह रसबाला एक दिन 'रस बानो' हो गई. उसे कैदी महिला की पुत्री के स्थान पर अनाथ बताया गया. जब किस्मत लिखने में विधाता से भूल होती आई है तो इंसानों का क्या ?
     और मुस्लिम दंपत्ति ने भी 'पाठशाला' के इस सहयोग का भारी इनाम दिया. पाठशाला में  बच्चों के लिए पीने के पानी का एक बड़ा टैंक बनवाया. हज़ारों रूपये इसमें खर्च हुए.
     अब रसबानो एक संपन्न परिवार में आ गई. उसके 'पिता' का घोड़ों और ऊंटों का बड़ा कारोबार था. एक से  एक बढ़िया नस्ल के अरबी घोड़े छोटी उम्र में खरीदे जाते थे, और उन्हें प्रशिक्षित करके ऊंचे दामों में  बेचा जाता था. पश्चिम की मांग के अनुसार बढ़िया जानवर तैयार करने में उन्हें भारी मुनाफ़ा होता था, क्योंकि ऊँट और घोड़े पूर्वी पिछड़े इलाकों में सस्ते मिल जाते थे. उनसे उन्नत किस्म के जानवरों की हायब्रिड नस्लें तैयार होती थीं. अच्छे खान-पान के साथ नफ़ासत की ट्रेनिंग उन्हें उम्दा माल बनाती थी.जबकि पूर्वी क्षेत्रों में तो इन्हें कभी चारे-पानी की कमी या दुर्भिक्ष के चलते वैसे ही छोड़ दिया जाता था, जहाँ ये कुछ औपचारिकताओं के बाद मुफ्त के माल की तरह मिल जाते थे.
     रसबानो का परिवार साल-दो साल में खाड़ी देशों में जाता रहता था.बारह साल की होने तक तो रसबानो ने अपने माँ-बाप के साथ हज यात्रा भी कर डाली. मक्का-मदीना और जेद्दाह में उसे बहुत आनंद आता था. वह अपने पिता के कारोबार को बहुत कौशल और ध्यान से देखती. अपनी माँ की तरह उसकी रूचि घर और लड़कियों वाले कामों में नहीं थी.
     परिवार इतना बड़ा था कि खुद रसबानो की माँ को भी पता नहीं था, कितने शहरों में कितने रिश्ते-नातेदार फैले हुए हैं. जहाँ जाती, रसबानो अपनों को पाती. फिर उसकी उम्र भी धीरे- धीरे ऐसी आ रही थी, जिसमें हर कोई लड़की को अपना समझता है. घर वाले चाहते हैं, कि वह दायरों में रहे, बाहर वाले चाहते हैं कि वह बेलगाम हर कहीं आती-जाती उपलब्ध रहे, और खुद मन चाहता है कि दुनियां क्यों न देखी जाय? रसबानो सोचती, कि ये मुकाम लड़कों की जिंदगी में क्यों नहीं आता ?
     रसबानो ने फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. न उसने अपनी पिछली जिंदगी के बारे में किसी से कुछ कभी पूछा, और न ही किसी ने कभी उसे कुछ बताया.
     इतना ज़रूर था, कि जब भी रसबानो भारत में अपने घर आकर वापस  लौटती, तो घर-गाँव की हर चीज़ उसे न जाने क्यों अपनी ओर खींचती. ये लगाव कैसा था, क्यों था, रसबानो कभी न जान पाती.
     हाँ, एक बार इस लगाव की सीरत, फितरत और ख़लिश किसी खुशबू की शक्ल में उसके मन के झरोखों से झांकी, जब सोमालिया से ...[जारी...]       

सूखी धूप में भीगा रजतपट [ भाग 31 ]

     रसबाला के जन्म की कहानी भी अजब थी. नन्ही बच्ची अभी गर्भ में ही थी, कि एक दिन गाँव के बाहर ऊँट पर पीने का पानी बेचने वाला आया. सुबह से उसके इंतज़ार में खड़ी रसबाला  की माँ का पारा तब एकाएक चढ़ कर सातवें आसमान पर पहुँच गया, जब उसके आगे खड़ी औरत ने दो हांडियां खरीद लीं, और ऊँट वाले का डोल ख़ाली हो गया.पानी की कीमत चुकाने के लिए लाये गए अंडे उसके हाथ में न होते तो रसबाला की माँ दोनों का मुंह नोंच लेती- मुए ऊँट वाले का भी, और कलमुही पानी की उस लुटेरी का भी. मुनाफाखोरों की तरह पानी की कालाबाजारी करने चली थी!
     लेकिन दोनों हाथों में पानी भरी हांडियां लिए इतराती वो मटक्को जैसे ही पलटी, उसकी कोहनी रसबाला की माँ के हाथ से टकरा गई, और तीनों अंडे हाथ से छूट कर रेत में गिर गए.एक तो ऐसा फूटा, कि मिट्टी पर जलती  धूप में आमलेट ही बन गया. बाक़ी दोनों भी  फूट कर मिट्टी में जा मिले.
     रसबाला की माँ ने आव देखा न ताव, पहले तो बाल पकड़े उस औरत के, और फिर झटके से उसकी दोनों हांडियां फोड़ डालीं. ऊँट घबरा कर लीद करता हुआ आगे भागा. भगदड़ मच गई.
     अब एक तरफ फूटे अंडे, दूसरी तरफ बिखरा पानी, दोनों तरफ पैनी प्यास...जम कर लड़ाई हुई दोनों में. बात केवल मार-पीट पर ही नहीं रुकी, हाथ में पहने मोटे कड़े के वारों से रसबाला की माँ ने उस अंडे फोड़ने वाली को बेदम करके ही छोड़ा. थोड़ी ही देर में गर्म रेत ने उबलते लहू के थक्के भी देखे. तमाशबीन  तितर-बितर और रसबाला की माँ की कलाई में हथकड़ी भी आ गई. जो हाथ पानी लेने गए थे, वो हथकड़ी पहन कर लौटे.
     उसका आदमी तो पैदाइशी मजदूर था. हथकड़ियों को जमानत के झमेलों से तोड़ पाता, तब तक तो रसबाला की माँ जेल में आ गई.
     और इस तरह रसबाला का जन्म भी जेल में ही हुआ. दादी ने पोती का मुंह नहीं देखा था, बस, नाम रख दिया रसबाला.वह भी इतनी समर्थ नहीं थी कि बच्ची को अपने साथ रख सके. बीमार, कृशकाय व जर्जर.
     और अपने बचपन को रसबाला ने सूखी धूप में खेलते और सूरज ढलते ही अँधेरी बैरकों में बंद हो जाते देखा.
     कैदियों के बच्चों की सार-सम्हाल करने वाली किसी संस्था के कदम उस जेल में पड़े, तब रसबाला चार साल की थी. एक समाज-सेविका ने जेल में ही सब औरतों से मिल कर उन्हें समझाया कि अपने साथ-साथ अपने बच्चों का भविष्य तबाह मत करो. नसीब की मारी माओं को भला इसमें क्या ऐतराज़ होता,कि उनके बच्चों को कोई अँधेरी सुरंग से उजाले की दुनियां में निकाल ले जाये.
     रसबाला कैदियों के बच्चों की एक आवासीय पाठशाला में चली गई. बच्चे इसी आसरे में पलने लगे. रसबाला की माँ का कारावास जब तक पूरा होता, एक मुस्लिम परिवार ने उसे गोद ले लिया...[जारी...]              

सूखी धूप में भीगा रजतपट [ भाग 30 ]

     ...जब नदी के किनारे से हारा-थका किन्ज़ान बोझल क़दमों और हैरत-भरे विचारों के साथ-साथ उस बूढ़े और नन्हे कुत्ते को लेकर अपने घर की ओर चला तो शायद वह सोच भी नहीं सकता था कि अब उसकी जिंदगी और उसका परिवार यही है. माँ के बारे में भी उसे कुछ खबर नहीं थी.
     वीरान पड़े घर में देर रात तक तो किन्ज़ान ने माँ का इंतज़ार किया, मगर फिर उसे किसी अनहोनी की आशंका सताने लगी. किसी तरह किन्ज़ान ने अपना और अपने साथियों का पेट भरा,और वे सो गए. जिंदगी ने सभी का इम्तहान लिया था, इसलिए सभी थके थे.
     अगली सुबह घर के दरवाज़े पर सूरज और पुलिस, साथ-साथ आये. पुलिस ने बताया कि रस्बी अब इस दुनिया में नहीं है. किन्ज़ान ने जिंदगी का वो अँधेरा देखा, जिसे दूर कर पाने में ताज़ा उगा सूरज भी लाचार था.
     दोपहर को दरवाज़े की घंटी बजने पर जब किन्ज़ान ने दरवाज़ा खोला तो एक जानी-पहचानी कार को खड़ा पाया. न्यूयॉर्क से आई महिला ने किन्ज़ान के मिशन की असफलता के लिए दुःख व्यक्त किया, और अपने नन्हे पुत्रवत प्यारे कुत्ते को ले जाने की पेशकश की. लेकिन जब किन्ज़ान ने महिला के दिए डॉलर लौटाने चाहे तो उसने कहा कि इन्हें किन्ज़ान अपने भविष्य के मिशन हेतु अग्रिम शुभकामनाओं के रूप में अपने पास रखे.
     किन्ज़ान ने लाचारी से यह प्रस्ताव स्वीकार किया, क्योंकि उसे महसूस हो रहा था कि महिला उसके साथ हुए हादसे के बारे में पूरी तरह जान चुकी है.
     अब किन्ज़ान का पहला मकसद बूढ़े से अपनी माँ के अतीत के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानना था. किन्ज़ान तो अब तक केवल यह जानता था कि वे लोग सोमालिया से यहाँ आये थे, किन्ज़ान के पिता अमरीकी सेना में थे, और सेना में रहते हुए ही उनकी मृत्यु हुई थी.
     बूढ़ा यह देख कर आश्वस्त था कि अब किन्ज़ान ने अपना गुस्सा छोड़ कर उसकी आत्मीयता को जगह दी है. उसने किन्ज़ान को किसी परीलोक की कहानी की तरह पिछली बातों से रूबरू कराया.
     ...किन्ज़ान की माँ रस्बी मूल रूप से भारत की रहने वाली थी. वहां उसका जन्म जैसलमेर के पास एक बहुत छोटे से गाँव में हुआ था. रस्बी ने अपने जीवन के पहले चार वर्ष तक कभी चन्द्रमा नहीं देखा था. उसे यह भी पता नहीं था कि  तारे क्या होते हैं. फूल-पत्तियां, पेड़ और पंछी रस्बी को जीवन के पहले चार साल तक कभी नहीं दिखे.
     रेत और रेत के चारों ओर एक ऊंची सी पत्थरों की दीवार, और आसमान से आती सूखी धूप ही बस उसका जीवन था.उसकी माँ इसी धूप में और औरतों के साथ कभी चक्की पीसती, कभी कपड़ा बुनती,कभी बांस की टोकरी बनाती, तो कभी पत्थर तोड़ती. इसी बीच उसे प्याज़, चटनी या किसी दाल के साथ सूखी चार मोटी-मोटी रोटियां मिलतीं. उन रोटियों को माँ खाती, और उनके कुछ टुकड़े नन्ही रस्बी को मिलते, जिसका नाम तब  रस्बी नहीं, रसबाला था.
     रसबाला के लिए इस सारे सहरा में एक छोटा सा नखलिस्तान, अमृत जैसे दूध की बूंदों का एक प्यारा सा झरना था, जो उसकी माँ की छाती से बहता था, बाकी दुनियां सूखी और बदरंग थी.  [जारी ...]     

Wednesday, April 4, 2012

सूखी धूप में भीगा रजतपट [भाग 29 ]

     ...किन्ज़ान बहुत क्रोध में था, वह शायद बूढ़े की जान ही ले डालता,लेकिन मार खाते-खाते भी बूढ़ा बार-बार गिड़गिड़ा कर यही कहे जा रहा था कि एक बार मेरी बात तो सुनो...
     किन्ज़ान एक पल हाथ रोक कर बोला-  बोल, बता, तूने ऐसा क्यों किया?
     बूढ़ा बोला- ...मुझे रस बानो ने भेजा था...लेकिन यह कहते ही बूढ़ा पश्चाताप से भर गया. अपने दांत काट कर बोला- मुझे माफ़ करदो, मैंने उसकी दी हुई कसम तोड़ दी.
     किन्ज़ान एकदम ठहर गया. उसे इस बात का ज्यादा  आश्चर्य नहीं था कि उसकी माँ ने ही उसे किन्ज़ान का मिशन फेल करने भेजा, बल्कि इस से भी ज्यादा तो वह यह देख कर चौंका, कि यह कौन व्यक्ति है जो उसकी माँ को 'रस बानो' नाम से पुकार रहा है?
     बूढ़ा किसी हताश अपराधी की तरह माथे पर हाथ लगा कर नीचे बैठ गया. उसे लग रहा था कि उस से गलती पर गलती हुए जा रही है.
     किन्ज़ान तो जैसे दो पल में ही किसी दूसरी दुनियां का वासी हो गया. उसे ऐसा लगा, जैसे किसी ने प्रश्नों का गट्ठर उस के दिमाग की नसों में घुसा दिया हो. वह भी ठीक बूढ़े ही की तरह अपने सर पर हाथ रख कर बूढ़े के सामने बैठ गया.
     बूढ़ा आत्मीयता से बोला- तुम्हारी माँ तुम्हें बिलकुल भी नुक्सान नहीं पहुँचाना चाहती थी. उसने केवल मुझसे यह कहा था कि मैं तुम पर नज़र रखूँ, और तुम्हें जब भी पानी जीतने की मुहिम पर जाते देखूं, तो उचित-अनुचित की परवाह किये बिना तुम्हें रोकने की कोशिश करूँ.
     किन्ज़ान एकटक बूढ़े को देखता रहा. एक पल सांस लेकर वह बूढ़ा  खुद ही फिर बोला- तुम्हारी नाव बुलेट-प्रूफ थी. इसमें गोली का असर नहीं होता था, मैंने किनारे से केवल इसमें लम्बा काट लगाने की कोशिश की. किन्तु मुझे छेद होता नहीं दिखा, और यह तेज़ी से भाग रही थी. मैं डर गया. तुम थोड़ी ही देर में छलनी हुई नाव से आसमान जैसी ऊंचाई से गिर जाने वाले थे. मैंने आपा खो दिया,और बिना सोचे-समझे नाव के किनारे पर दनादन गोलियां बरसा डालीं. कह कर बूढ़ा फिर से अपने आंसू पोंछने लगा. किन्ज़ान और कुछ पूछता, इस से पहले ही बूढ़ा फिर अपने आप बोल पड़ा- मैंने आज तक अपनी बहन की कोई बात नहीं टाली...उसने पहले ही बहुत दुःख झेले हैं...
     किन्ज़ान सब भूल गया. अपने मिशन की असफलता भूल गया. अपना दर्द भूल गया. अपने आप को भी भूल गया. बस, उसे याद रहा तो केवल यह, कि एक अजनबी बूढ़ा उसकी माँ को अपनी बहन कह रहा है. और माँ का नाम रस्बी नहीं बल्कि रस बानो उच्चार रहा है. उसकी माँ के आदेश को पत्थर की लकीर मान कर इतना बड़ा जोखिम ले कर उसे बचाने चला आया है. माँ द्वारा कसम दिए जाने की बात कर रहा है... और अपने से चौथाई उम्र के लड़के से मार खाकर भी अविचलित बैठा है. ऐसे में किन्ज़ान को अपनी माँ की याद आई. [ जारी...]         

Tuesday, April 3, 2012

सूखी धूप में भीगा रजतपट [ भाग 28 ]

     ...और तीखी आवाज़ आई, जैसे किसी ने नौका पर रिवाल्वर की गोलियों से वार किया हो.वार इतना आक्रामक था, कि बुलेट-प्रूफ परदे पर पड़ी खरोंच किसी ब्लेड की तरह एक ओर से परदे को चीर गई. पहले एक गोली चली, फिर कुछ रुक कर तीन-चार गोलियों की आवाज़ आई.
     बहते पानी में भागती नौका का जो हिस्सा खुला, उसके बाहर की ओर पलटते ही छोटा कुत्ता एक भय-मिश्रित चीत्कार के साथ उछलकर पानी में बाहर जा गिरा.बिजली की सी गति से किन्ज़ान ने बेल्ट हटा कर पानी में कूदने में पल का हजारवां हिस्सा भी नहीं गंवाया. उसे अपने मिशन की शुरुआत पर अमेरिकी महिला के कहे शब्द शायद आकाश से हुई वाणी की तरह कौंध कर सुनाई दे गए- "मैं अपना बेटा ही नहीं, अपनी जिंदगी का एक भाग तुम्हें दे रही हूँ..."
   कुशल तैराक किन्ज़ान ने झपट कर कुत्ते को हाथों में पकड़ लेने के बाद तेज़ी से दूर जाती नौका की ओर एक हसरत-भरी नज़र डाली, जो किसी आकाश में उड़ते विमान की तरह तेज़ी से ओझल हो गई. किन्ज़ान साँझ के झुटपुटे में तैर कर उदासी में डूबा किनारे आया. निढाल होकर बैठ जाने के बाद , अब उसका माथा यह सोच कर चकरा रहा था, कि उस पर गोलियों से वार करने वाला भला कौन हो सकता है?
     उसकी न तो किसी से दुश्मनी थी, और न ही उसके अभियान से किसी और को कोई नुक्सान होने वाला था. उसकी माँ रस्बी ने आज सुबह ही गुस्से में उसे प्लेट खींच कर ज़रूर मारी थी, परन्तु यह वह सपने में भी नहीं सोच सकता था कि माँ उस पर ऐसा कातिलाना हमला कभी कर सकती हैं.माँ को तो यह भी पता नहीं था, कि वह इस समय कहाँ है? वह तो कुछ भी बता कर घर से नहीं आया था. फिर माँ की जिंदगी में पिस्तौल उसने कभी देखी तो क्या, सुनी तक न थी.फिर भी उसे इस घड़ी में माँ याद आई. वह तेज़ी से घर पहुँच कर माँ की गोद में आराम करना चाहता था. माँ के हाथ से कुछ खाना चाहता था, और उसे यह भरोसा दिलाना चाहता था कि यदि वह न चाहेगी, तो वह ऐसी यात्रा पर फिर कभी न जायेगा.
     सुबह माथे में लगी चोट भी पानी में भीग जाने के बाद और तीखी होकर उभर आई थी. एक हाथ में छोटे कुत्ते को उठाये, वह हथेली से ज़मीन का सहारा लेकर जैसे ही उठा, उस वीराने में उसका सामना उसी ठिगने बूढ़े से हुआ जो अपनी लम्बी दाढ़ी के कारण इस समय भी किन्ज़ान को फ़ौरन पहचान में आ गया.बूढ़ा आते ही  किन्ज़ान से लिपट गया, और जोर-जोर से रोने लगा. इतने बूढ़े आदमी को बच्चों की तरह फूट-फूट कर इस तरह रोते हुए, किन्ज़ान ने तो क्या, किसी ने कभी न देखा था.
     किन्ज़ान भौंचक्का रह गया. उसे यह सारा माज़रा बिलकुल समझ में नहीं आया. बूढ़ा रोने के साथ-साथ तेज़ी से काँप भी रहा था. जैसे ही उसने कहा, कि किन्ज़ान की नौका पर गोली उसने चलाई थी, किन्ज़ान ने हाथ के कुत्ते को एक ओर रखा और पूरी ताकत से बूढ़े पर वार किया. पहला मुक्का पड़ते ही बूढ़े के होठों से खून का फव्वारा छूट पड़ा. पर इतने से किन्ज़ान रुका नहीं, उसने मुक्कों और लातों की झड़ी लगा दी. [जारी...]

Monday, April 2, 2012

सूखी धूप में भीगा रजतपट [भाग 27 ]

     ...अगली सुबह जब भारतीय दंपत्ति उठ कर बाहर लॉन में आये तो यह देख कर दंग रह गए कि आमतौर पर देर तक सोने के आदी उनके दोनों बच्चे उनसे पहले से ही जाग गए हैं, और बगीचे में पानी देने में नाना की मदद कर रहे हैं. बच्चों की मम्मी में भी बच्चों को देख कर कर्तव्य भाव जग गया और उन्होंने भीतर जाकर रसोई की जिम्मेदारी संभाल ली. नाना भी भरे-पूरे परिवार के साथ रहने का अवसर पाकर अतिरिक्त रूप से उत्साहित थे.
     दोपहर को भोजन से निवृत्त होने के बाद बच्चों के माता-पिता और नाना कमरे में बातों में इतने तल्लीन थे कि बच्चे कब बाहर जाकर एक डिपार्टमेंटल  स्टोर से रंग-बिरंगी मोमबत्तियों के पैकेट्स खरीद लाये, ये उन्हें पता ही न चला.
     इतनी मोमबत्तियां देख कर बच्चों की मम्मी ने उनकी ओर प्रश्न-वाचक नज़रों से देखा. बच्चे भी एक बार तो संकोच के कारण कुछ न बोल पाए, किन्तु पिता की ओर से दोबारा प्रश्न होने पर बेटी ने सर झुका कर धीरे से कहा- " हम शाम को रस्बी आंटी और किन्ज़ान भैया की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करेंगे."
     माता-पिता दोनों एकसाथ अभिभूत हो गए. उन्होंने देखा नाना की मिंची आखें भी नम हो आईं.माता-पिता नाना के पास से उठ कर भीतर चले गए. नाना के अकेले होते ही दोनों बच्चों ने करीब आकर उन्हें घेर लिया.
     -नाना, क्या किन्ज़ान भैया  को भी पानी में बहते हुए कहीं रस्बी आंटी का शव दिखाई दिया? बेटे ने अपनी जिज्ञासा रखी. ऐसा लगता था कि बच्चे अब तक रात की कहानी से उबर नहीं पाए थे.
     नाना ने इत्मीनान से एक गहरी सांस ली, और बोले- दरअसल किन्ज़ान झरना पार करके नीचे आ ही नहीं सका ?
     -क्यों ? क्या हो गया था ? फिर नाव टूटी कैसे ? बच्चों के सवाल किसी बंद गठरी के खुलने से जैसे निकल-निकल कर गिरने लगे थे.
     नाना ने किसी उड़ती चिड़िया की तरह कहानी का सूत्र फिर थाम लिया-"जैसे ही किन्ज़ान अपनी नौका में सवार होकर रवाना हुआ, वह बहुत खुश था. उसके साथ में न्यूयॉर्क से लाया गया ब्राज़ीलियन छोटा कुत्ता भी था, जिसके लिए बॉल के भीतरी अस्तर में खास बेल्ट से बंधी जेब भी बनाई गई थी.खुद किन्ज़ान के लिए भी नौका के भीतर सुरक्षित और मज़बूत ट्रांसपेरेंट  सेफ्टी-कैप्सूल था. दोनों के मुंह के करीब जूस के पाउच इस तरह लगाये गए थे, कि ज़रा से प्रयास से जूस पिया जा सके. लेकिन..."
     - लेकिन क्या नाना ? दोनों एकसाथ बोल पड़े.
     -एयर-टाइट नौका में ऑक्सिजन भी पर्याप्त मात्रा में थी.पानी की दहाड़ें, भीतर भी सुनाई दे रहीं थीं. यद्यपि आवाज़ बाहर की तुलना में भीतर बहुत कम थी. बादलों की गड़गड़ाहट जैसी ध्वनि थी. तभी अचानक एक भयंकर ...[जारी ...]    

Sunday, April 1, 2012

सूखी धूप में भीगा रजतपट [ भाग 26 ]

     बच्ची को दवा देकर सुला दिया गया.नाना का ही नहीं, खुद उसके मम्मी-पापा का भी यही मानना था कि लगातार बैठ कर कहानी सुनने से हुई थकावट के चलते बच्ची को हरारत हो गई है.भोजन के बाद दोनों बहनों ने भी मेहमान दंपत्ति से जाने की इजाज़त ली क्योंकि उन्हें भी सुबह जल्दी ही अपनी ड्यूटी के स्थान के लिए वापस निकलना था. बेहद आत्मीयता से वे दोनों अभिवादन करके चली गईं.
     नाना इतने उम्रदराज़ होते हुए भी बिलकुल थके नहीं हैं, यह देख कर मेहमान दंपत्ति और उनका बेटा फिर से नाना के पास आ बैठे. माँ ने एक बार बेटे से कहा भी, कि बहुत रात हो चुकी है, और अब वह सो जाये, किन्तु उस पर माँ की बात का कोई असर नहीं हुआ. वह उसी तरह नाना के पास बैठा रहा. कुछ देर की चुप्पी के बाद बेटे ने ही मौन तोड़ा, वह बोला- नाना ! बाद में रस्बी आंटी को पानी में बहते हुए भी कहीं किन्ज़ान की लाश दिखाई दी?
     यह सुनते ही नाना थोड़ा संकोच के साथ यह देखने लगे, कि क्या वास्तव में इतनी रात गए वे लोग कहानी के बाबत और सुनना चाहते हैं? माता-पिता के चेहरे पर भी बेटे जैसी उत्सुकता देख कर नाना ने कहना शुरू किया- "रस्बी गिरते ही मौत के साथ दूसरी दुनिया में चली गई. उस दूसरी दुनिया में किसी को तलाश करना बहुत मुश्किल होता है. हम सोचते हैं कि जो लोग दुनिया से चले जाते हैं, वहां भगवान के घर एक छत के नीचे सब मिल जाते हैं, किन्तु ऐसा नहीं है. यहाँ तो फिर भी हम सौ-पचास साल के लिए आते हैं, और एकसाथ हमारी तादाद चंद अरब में ही होती है, परन्तु उस दुनिया में तो हम करोड़ों सालों से करोड़ों की संख्या में जाते रहे हैं. वहां न किसी को ढूंढना संभव है, और न किसी का आसानी से ऐसे मिल जाना. लेकिन...
     -...लेकिन क्या नाना ?
     -लेकिन फिर भी उस दुनिया और इस जगत की दूरी ऐसी नहीं है, कि वहां से कभी कोई लौट कर आया ही न हो.
     - क्या मतलब ? क्या मरने के बाद भी कोई फिर कभी जीवित हुआ है ?
     -नहीं, जीवित तो नहीं हुआ, मगर ...मगर ऐसा ज़रूर हुआ है कि कोई ठीक से पूरी तरह मर नहीं सका.
     - पूरी तरह न मरना क्या होता है? माँ और पिता ने बेटे जैसी ही उत्सुकता से एकसाथ पूछा.
     - यदि व्यक्ति असमय, किसी ज़बरदस्त लगाव के रहते या फिर किसी अभिलाषा के रहते अकस्मात् चला जाता है, तो उसके शरीर के साथ उसकी "जान" या आत्मा के सारे तंतु दुनिया से सिमट नहीं पाते. ऐसे में वह कभी-कभी किसी न किसी सूरत में दुनिया में फिर झलकता है, कभी हम इसे आत्मा का भटकना कहते हैं, तो कभी पुनर्जन्म होना.
     ऐसी बातें उन लोगों ने भारत में तो सुनी थीं, किन्तु अमेरिका में इतने अनुभवी बुज़ुर्ग से सुनना उन्हें रोमांचित  कर गया. बेटे के तो यह सुनते ही रोंगटे खड़े हो गए. उसने अपने बिस्तर पर लेट कर झटपट एक चादर से मुंह ढक लिया. नाना ने भी उन्हें थका जान कर अब सो जाने का आग्रह किया...[जारी...]     

मैं जानता हूं कि...

 उड़ान और सामाजिकता का संबंध बेहद दिलचस्प है। आप जितना ऊपर उड़ते जाते हैं समाज नीचे उतना ही आपसे दूर होता जाता है। ये बात शायद उस परिंदे के ...

Lokpriy ...