Sunday, February 5, 2012

किस-किस बात पर गर्व किया जा सकता है

हम किसी भी धर्म के मानने वाले हों, किसी  भी जाति के हों,किसी भी देश में रहते हों, ऐसी कौन-कौन सी बातें हैं जिन पर हम गर्व कर सकते हैं?
हम हर उस व्यक्ति पर गर्व कर सकते हैं जो अच्छा गाता हो.
हम हर उस इंसान पर भी गर्व कर सकते हैं जो बेहतर नाच सके. 
अच्छा अभिनय भी गर्व करने की चीज़ है. 
किसी भी विषय को अच्छी तरह पढ़ने वाले तो हैं ही गर्व करने योग्य.
अच्छे खिलाड़ियों पर भला किसे गर्व न होगा?
अच्छे व्यापारी,अच्छे अधिकारी,अच्छे कर्मचारी,अच्छे वकील-डाक्टर-इंजिनियर पर कोई भी गर्व करेगा. 
अच्छे शिक्षक किसे अच्छे नहीं लगेंगे?
अच्छे नेता को तो लोग पूजते हैं. 
अच्छा चित्रकार-मूर्तिकार या वाहन चालक समाज के लिए धरोहर ही है. 
अच्छा भोजन बनाने वाला और घरेलू काम करने वाला किसे पसंद नहीं आएगा? 
अच्छा बैंकर क्या कोई कम अच्छा है?
इतने विकल्प कोई कम नहीं होते. फिर भी इन सब विकल्पों के पार जाकर हर समाज, देश या घर में जब कुछ लोग ऐसे निकल ही आते हैं जो गर्व करने लायक नहीं होते, तो मन खट्टा हो जाता है. खटास का कोई इलाज है?     

Saturday, February 4, 2012

तिथियाँ बदलती हैं, दिन नहीं

एक सड़क के किनारे एक पेड़ के नीचे एक द्रष्टिहीन व्यक्ति बैठा था. पुरानी कहानियों में तो कह दिया जाता था कि वह बैठा तपस्या कर रहा था. पर अब ऐसा कहना निरापद नहीं है, क्या पता वह क्या कर रहा हो?
थोड़ी ही देर में उधर से भागता हुआ कोई आदमी गुज़रा. आदमी ने अंधे व्यक्ति से कहा-श्रीमान, क्या यह सड़क मुझे शहर की ओर पहुंचा देगी? उसने उत्तर दिया-पहुंचा तो देगी परन्तु तुम्हें इस पर चल कर जाना होगा. आहट से ऐसा लगा मानो वह आदमी चला गया.
थोड़ी ही देर में फिर एक आदमी की आहट आई. आदमी बोला- क्योंरे, ये रास्ता शहर को ही जा रहा है  न ?
अंधे व्यक्ति ने कहा- रास्ता तो नहीं जाता पर मुसाफिर पहुँच जाते हैं. आदमी चला गया. 
अभी कुछ ही समय गुज़रा होगा कि एक गाड़ी के रुकने की आवाज़ आई. फिर एक स्वर सुनाई दिया-ओ अंधे, वो सामने शहर ही दिख रहा है न ? 
जी सर, वो शहर ही है...आपकी विज़िट की तैयारी करने आपका आदमी भी अभी-अभी गया है.जनता तो पहले से ही जाने लगी थी. 
कार वाले व्यक्ति ने आँखें तरेरीं-आँखें नहीं हैं, फिर भी पूरी पंचायती कर लेता है.क्यों?
जी सर, मन की आँखें तो हैं.     

शब्दकोष में से ऐसे शब्द हटाये नहीं जा सकते?

कभी-कभी मुझे लगता है कि कुछ शब्द हमने जल्दबाजी में डिक्शनरी में डाल लिए. "स्वार्थी" शब्द पर गौर कीजिये. हमने पूरी तरह नकारात्मक अर्थ देकर इस शब्द को लोकप्रिय बना रखा है, पर क्या वास्तव में यह शब्द यही भाव लिए हुए है? 
स्वार्थी कोई हो ही नहीं सकता. आप जब घर में होते हैं तो आप चाहे जैसे कपड़े पहने हो सकते हैं.लेकिन घर में किसी दूसरे के आते ही आप अपने कपड़ों को लेकर सतर्क हो जाते हैं. कई बार तो उन्हें बदल डालते हैं. तो इसका मतलब यह हुआ कि आपने अच्छे कपड़े अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए पहने हैं. आप अकेले में चाहे जो कुछ खा लें, यदि कोई आपके साथ होगा तो आप अपने आप औपचारिक हो जायेंगे. यदि कोई कंजूसी करके पैसा जोड़ता है तो अधिकतर वह पैसा किसी और के काम आएगा. यदि कोई यह सोच कर जोड़ता है कि वह इस पैसे को अपने लिए ही भविष्य में काम में लेगा, तो वह व्यक्ति अपने परिजन को कष्ट न होने देने का भाव रखता है. इस प्रकार वह किसी और की जवाबदेही अपने पर ले रहा है, वह भला स्वार्थी कैसे हुआ. 
तो फिर स्वार्थी कौन और कैसे हुआ? यदि किसी व्यक्ति के द्वारा उसके अपने हित के लिए भी किये जा रहे काम को आप उसकी नकारात्मकता कह रहे हैं तो यह स्वार्थी की नकारात्मकता कहाँ हुई? यह तो आपकी नकारात्मकता हुई. ऐसे में 'स्वार्थी' नकारात्मक कहाँ हुआ. यह तो उस व्यक्ति की उसके अपने हक़ में की गई जागरूकता हुई. 
मान लीजिये, एक नेता वोट मांग रहा है. ये वोट वो अपने लिए मांग रहा है. यदि वह वास्तव में इस योग्य है कि उसे वोट दिया जाये तो फिर वह स्वार्थी नहीं हुआ. यदि वह वोट देने योग्य नहीं है फिर भी मांग रहा है तो वह इसीलिए तो मांग रहा है कि अन्यथा आप उसे वोट नहीं देंगे. तो वह स्वार्थी कहाँ हुआ? अब इसे इस तरह देखिये- यदि आपने उसे वोट दे दिया तो आप उसके समर्थक हैं, उसने वोट मांग कर क्या स्वार्थ साधा? और यदि आपने उसे वोट दिया ही नहीं तो उसने कौन सा स्वार्थ साधा?   

Friday, February 3, 2012

तो क्या कबीर को अब रिटायर करें?

सूरज उगता तो रोज़ है पर चुपचाप उग जाता है. उस से सोते हुए इंसान को जगाने के लिए कोई आहट नहीं होती. शहर में बहुत सारे लोगों को सुबह-सुबह काम पर जाना होता है. कोई अखबार बांटने जा रहा है तो कोई दूध बांटने. कोई स्कूल-कॉलेज के लिए तैयार होना चाहता है तो कोई जाने वालों को खाने का टिफिन देने के लिए उठना चाहता है. किसी की मिल उसे पुकारती है तो किसी के खेत. किसी को सुबह-सुबह भगवान का साक्षात्कार चाहिए तो किसी को सेहत के लिए ताज़ी हवा में दौड़ना है. 
अब ये सब क्या अपने-अपने मोबाइल में अलार्म  बजाएं?क्या उठने और न उठने की अनिश्चितता में आधी नींद सोयें? क्या अपने-अपने काम में लेट-लतीफ़ कहलाने का जोखिम उठायें? 
सुबह छह बजे मस्जिद से अज़ान की मोहक आवाज़ आती है जो महल्ले भर में सुनाई देती है.उतनी ही सुबह मंदिर से निराली आवाज़ गूंजती है, जिसकी पहुँच दूर-दूर तक है. ये आवाजें हजारों लोगों को जागने का आह्वान करती हैं. 
"कांकर- पाथर जोड़ कर मस्जिद लई चिनाय 
ता चढ़ मुल्ला बांग दे, क्या बहरा हुआ खुदाय?"
बरसों पहले कबीर न जाने क्यों ऐसा लिख गए? तो क्या अब कबीर बाबा को ख़ारिज करें?    

गलती नौ जनों की है -अमेरिका और यूरोप तक परेशान हैं इनसे

नौ लोगों को पकड़ना कोई मुश्किल काम नहीं है. एक थानेदार भी आसानी से पकड़ कर इन्हें जेल में डाल सकता है. लेकिन आखिर कायदा-कानून भी कोई चीज़ है, कोई भी, कहीं भी, कैसे भी इन्हें कैसे पकड़ ले? इन्हें देखा जा सकता है. इनकी तस्वीरें उतारी जा सकती हैं. इनके बारे में मीडिया में खूब लिखा जा सकता है. इनकी चिरौरी-बिनती करने के लिए हवन-यज्ञ किये जा सकते हैं. इनके चाल-चलन पर छींटा-कशी की जा सकती है, लेकिन इन्हें पकड़ा नहीं जा सकता. सब थानों की अपनी-अपनी सीमा होती है,सब जगह की अपनी-अपनी पुलिस होती है. ऐसा नहीं है कि कोई भी हथकड़ी लेकर जाये और इन्हें धर ले.
ये नौ चाहे जिसकी जन्म-कुंडली बदल दें, इनकी चाल नहीं बदली जा सकती. 
आपका अनुमान बिलकुल सही है. बात नौ ग्रहों की ही की जा रही है. 
हम सब ग्लोबल-वार्मिंग को लेकर परेशान थे कि इन्होंने कुपित होकर ग्लोब को ठंडा कर दिया. हम भाप बन कर उड़ते पानी से पेड़-पौधों के सूखने की चिंता में थे कि इन्होंने आसमान से बर्फ की झड़ी लगा दी. हम एक-दो-तीन गिन रहे थे कि इन्होंने माइनस दस-बीस-तीस का राग छेड़ दिया.
क्या माना जाय?क्या मानव की करनी से ईश्वर का अपनी बनाई दुनिया के प्रति उत्साह ठंडा हो गया?        

Thursday, February 2, 2012

सत्ताधीशों के हुकुम की गुलाम- सांख्यिकी अर्थात स्टेटिस्टिक्स

एक राजा था. उसकी प्रजा में सौ आदमी थे. राजा के महल में अपार दौलत थी. खजाने में बेशकीमती हीरे-जवाहरात से लेकर असंख्य स्वर्ण-मुद्राएँ भरी थीं. प्रजा के पास कुछ न था. जो कुछ पैदावार खेतों में होती, राजा लगान में ले लेता. वक्त पड़ने पर लोग महल में आकर हाथ फैलाते और शासन से उधार लेते.यह उधार कभी चुकने में नहीं आता. 
घूमते-घूमते एक दिन एक फ़कीर उधर आ निकला. उसकी भेंट राजा से भी हुई. फकीर राजा से बोला- आपके राज्य में गरीबी बहुत है. प्रजा के पास रोटी कपड़ा मकान की भी माकूल व्यवस्था नहीं है. यह सुन कर राजा क्रोध से तमतमा गया. बोला- क्या बात करते हो ? मेरे राज्य में हर आदमी करोड़पति है.फकीर मुंह बाये देखता रहा. राजा ने उसे समझाया- मेरे खजाने में सौ करोड़ से ज्यादा मुद्राएँ प्रति वर्ष आती हैं. राज्य की कुल जनसँख्या है- सौ. तो राज्य की प्रति व्यक्ति आय करोड़ से ज्यादा हुई या नहीं. फकीर राजा का लोहा मान गया और जोर-जोर से राजा की जय बोलने लगा. 
कहानी ख़त्म होते ही फकीर चला गया और एक दिन भारत के प्रधान मंत्री के सपने में आया. प्रधान मंत्री ठीक से सो नहीं पा रहे थे, अपने देशवासियों की गरीबी की चिंता उन्हें हो रही थी.वैसे ऐसी चिंता उन्हें कभी होती नहीं थी पर ज़ल्दी ही चुनाव होने वाले थे, इसलिए उन्हें गरीबी की नहीं, बल्कि गरीबी के असर की चिंता थी. फकीर उनके सपने में था ही, फकीर ने न जाने कैसा मंत्र पढ़ा कि थोड़ी देर में सपने में प्रधान मंत्री की जय-जय कार होने लगी. देश के हर भिखारी  के कटोरे में तरेपन-तरेपन हज़ार रूपये दिखने लगे.     

Wednesday, February 1, 2012

आजकल कोई होता नहीं है पर वो था

आजकल कोई तटस्थ या निष्पक्ष नहीं होता. किसी अपवाद की बात हम न करें, क्योंकि अपवाद तो अपवाद ही होते हैं, मुश्किल से मिलते हैं. लोग किसी न किसी तरफ होते हैं. कोई धर्म से संचालित है, कोई जाति से, कोई समाज से, कोई परिवार से. और कुछ नहीं तो पैसे या स्वार्थ से ही संचालित हैं लोग. उधर बोलेंगे जिधर स्वार्थ होगा. सांसदों से कभी भी पूछिए- क्या तुम्हारा भत्ता चौगुना बढ़ना चाहिए, फ़ौरन बोलेंगे- हाँ, और वह भी एक स्वर से, बिना किसी अपवाद के. सरकारी कर्मचारियों से पूछिए- क्या तुम्हें हर साल प्रमोशन और तुम्हारे सारे घर को पेंशन मिले? उनका उत्तर 'हाँ' में ही होगा. ऐसा कहीं कोई मुश्किल से ही मिलेगा जो यह कहे कि वेतन योग्यता और काम के हिसाब से ही मिलना चाहिए. 
आज मुझे एक ऐसा व्यक्ति मिला जो बिलकुल निष्पक्ष था. उसके आगे राजा और रंक में कोई भेद नहीं था.वह गोरे और काले में कोई भेद नहीं मानता था. अमीर-गरीब की अवधारणा से भी वह नावाकिफ था. सच पूछा जाये तो वह व्यक्ति भी नहीं था. उसका नाम था समय. 
आप सोचेंगे कि समय मुझे आज ही मिला हो, ऐसा कैसे हो सकता है? 
वास्तव में मेरा ध्यान आज ही इस बात पर गया कि समय कितना समदर्शी है. सब पर चौबीस घंटे का दिन लेकर ही गुजरता है. इतना बराबर का बंटवारा आज भला और किसका है? जो लोग महा-आलसी हैं, हर काम को घिसट-घिसट कर करते हैं, उन्हें भी समय दिन में चौबीस घंटे ही देता है और जो फ़टाफ़ट सारा काम झटपट निपटाते  हैं, उन्हें  भी पूरे चौबीस घंटे दे देता है.समय जैसी निष्पक्षता सब को क्यों नहीं आती?    

शोध

आपको क्या लगता है? शोध शुरू करके उसे लगातार झटपट पूरी कर देने पर नतीजे ज़्यादा प्रामाणिक आते हैं या फिर उसे रुक- रुक कर बरसों तक चलाने पर ही...

Lokpriy ...