Saturday, December 24, 2011

दो शब्द

दो शब्द कहने की परंपरा बहुत पुरानी है. मराठी भाषा में इन्हें चार शब्दों के रूप में कहा जाता है. मज़े की बात यह है कि "दो शब्द" के नाम पर अक्सर जो कुछ कहा जाता है, वह बहुत लम्बा-चौड़ा होता है. प्राय दो शब्द किसी 'मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि या विशिष्ट वक्ता' से कहलवाए जाते हैं, अतः उन्हें रोकने-टोकने की न तो कोई प्रथा होती है और न ही ज़रुरत. क्योंकि दो शब्द कहने सुनने वाले जानते हैं, कि जो कुछ कहा जायेगा, सुना जायेगा. सुना न भी जाये,  कम से कम सहा तो  जायेगा.
हाथ कंगन को आरसी क्या?
ये देखिये, मैं ही आपसे कितना और क्या-क्या कह गया. और ये कोई दो या चार शब्दों की बात नहीं है, बल्कि चार सौ बार की बात है.
अपनी इस ४०० वी पोस्ट में आपको क्रिसमस की बधाई दे रहा हूँ. और शुभकामनायें  दे रहा हूँ आने वाले नए साल २०१२ की.
साथ ही मैं अपने सभी मित्रों, शुभ-चिंतकों और पाठकों से यह भी निवेदन करना चाहता हूँ कि अब मैं नए वर्ष में ही पुनः हाज़िर हो सकूँगा. 

Thursday, December 22, 2011

पथिक तुम भूमि पर बैठो, निहारो दूर से महलों की शोभा,

वैसे तो दिल्ली पूरी ही आलीशान है,पर कुछ इमारतें तो यकीनन भव्य हैं. राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, लालकिला...ये फेहरिस्त आसानी से पूरी नहीं होगी.
एक समय था कि कर्नाटक के विधानसभा भवन को बंगलुरु के दर्शनीय स्थलों में अहम स्थान प्राप्त था. आज भी है.
जब महाराष्ट्र विधानसभा भवन बन कर तैयार हुआ तो तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने इसका उदघाटन करते हुए कहा था कि इस आलीशान भवन में , भविष्य में न जाने कितने अहम फैसले लिए जायेंगे.
मध्य प्रदेश का विधानसभा भवन पहाड़ की चोटी  पर जब खड़ा हुआ तो लोग भूल गए कि इस राज्य को कभी पिछड़ा कहा जाता था.
राजस्थान के विधानसभा भवन ने रजवाड़ों की महलिया शान को जीवंत कर दिया.
लगभग हर प्रदेश में अरबों की लागत से विधायकों के लिए  तिलिस्मी इमारतों का निर्माण हुआ.
जनता ने इन्हीं को देख कर अरबों की गिनती सीखी.
लेकिन कहते हैं कि समंदर का सारा जल मिल कर भी कभी एक सीप की प्यास नहीं बुझा पाता.
देश के लिए एक कानून बनवाना है. लेकिन इनमें से कोई इमारत शायद काम न आये. देशवासियों को नीली छतरी तले आज़ाद मैदान में ही बैठना पड़े.  
     

Wednesday, December 21, 2011

हमारी और हमारे ग्रंथों की महानता याद दिला दी रशिया ने...'थैंक्स' रशिया के लिए

हम एक हो गए. हमें अहसास हो गया कि "गीता" वास्तव में महान ग्रन्थ है.यह मांग बिलकुल जायज़ है कि इसे "राष्ट्रीय ग्रन्थ" घोषित किया जाय.हमारे मस्तिष्कों की पुनश्चर्या हो गई कि हम अपने राष्ट्रीय चिन्हों की गरिमा के प्रति सचेत हों.
अब लगे हाथों हमें रशिया को यह भी बता देना चाहिए, कि हम गीता को किस कार्य में लेते हैं. हमारी अदालतों में गवाह के तौर पर आने वाले हर  शख्स को 'गीता' पर हाथ रख कर यह कसम खानी पड़ती है कि वह जो कुछ कहेगा, सच कहेगा. वह फिर क्या कहता है, यह हमारी चर्चा का विषय नहीं है.
हमारी अदालतों की गवाहियों में सत्य कितना प्रतिशत होता है, यह अलग से किसी शोधार्थी का विषय है.
फ़िलहाल हमारे पास एक नया मुद्दा तो आ ही गया है. हमारे पास वैसे भी मुद्दों का अकाल रहता है.
रशिया ने आज तो गीता पर टिप्पणी की है, कल वह हमारे गवाहों के बयानों पर टिप्पणी करेगा, परसों हो सकता है कि वह हमारी अदालतों में लंबित मुक़दमे भी गिनने लगे. धीरे-धीरे उसकी रूचि हमारे मामलों में बोलने की हुई तो वह हमारी और भी किताबें पढ़ने लगेगा.
वैसे भारतीय साहित्य का रुसी अनुवाद तो बहुत पहले से होने लगा था? गीता का नंबर अब आया है, या गीता पढ़ी अब गई है? बहरहाल, रशिया में पढ़ तो ली गई.         

Tuesday, December 20, 2011

बीज

बीज की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह वैसा ही फल फिर उगा सकता है, जैसे फल से वह बीज खुद निकला है.
रशिया ने 'गीता' पर प्रतिबन्ध लगा दिया. स्वाभाविक है कि भारत में बवाल मच रहा है.
रशिया ने प्रतिबन्ध क्यों लगाया, इस पर भारत के पास कहने के लिए कुछ विशेष नहीं है. यदि गीता को एक धार्मिक ग्रन्थ भी मान लिया जाय, तब भी रशिया के संविधान में यह नहीं लिखा कि वहां सभी धार्मिक ग्रंथों का सम्मान किया जायेगा.किसी एक देश की आस्था जिस विचार में हो वह विचार  सब जगह सर्वमान्य नहीं माना जा सकता.
यदि तार्किकता के द्रष्टिकोण से देखें, तो पश्चिम सहित अन्यान्य देशों में 'रिज़ल्ट-ओरिएंटेड' समाज है. कर्म करो, और फल की चिंता मत करो, यह बात वहां किसी को समझाना आसान नहीं है.किसी एक विचार-द्रष्टि या लक्ष्य के लिए अपने-पराये सब को मार देने के आह्वान का भी अंध-समर्थन नहीं किया जा सकता.
गीता जिस घटना का प्रतिक्रियात्मक उत्पाद है, उस महाभारत में भी तो कोई महात्म्य नहीं छिपा. फिर भी कोहराम मच रहा है तो शायद इसलिए, कि गीता का बीज महाभारत से है. इसे 'कट्टरपंथी साहित्य' कहने का तो शायद कोई औचित्य नहीं है. बात केवल जन-भावनाओं के सम्मान की हो सकती है, लेकिन उसके लिए किसी को बाध्य तो नहीं किया जा सकता.     

Monday, December 19, 2011

मानव अधिकार "मानव" पर लागू हैं

आज एक विद्यार्थी ने मुझसे एक ऐसा सवाल पूछा, जिसका उत्तर उसे दे देने के बावजूद मैं अपने से संतुष्ट नहीं हूँ.
उसने मुझसे पूछा कि कुछ धन के लिए एक वृद्धा के पैर काट कर उसके चांदी के कड़े निकाल कर  उसे जान से मार देने वाला एक शख्स अब जेल में है, यहाँ उसकी सुख-सुविधा, आज़ादी, चिकित्सा सुविधा, खाने-पहनने की सुविधा तथा मनोरंजन को लेकर उसके मानव अधिकार क्या-क्या हैं?
प्रश्न अपने आप में मानवता के माथे का कलंक सरीखा है. वृद्धा अब परलोक में है, उसे इस धरती के किसी न्याय-अन्याय से अब कोई सरोकार नहीं है.वृद्धा का परिवार और उसके वंशज अब भी इसी दुनिया में हैं, उनके मानस पर जो न मिटने वाले ज़ख्म हैं, उनपर वही 'क्रूरता' थोड़ा बहुत मरहम लगा सकती है, जो कातिल को न्याय के मंदिर में दी जाएगी.
क्या ऐसे में पीड़ित के परिवार को "बदले की भावना मत रखो", "जो हुआ उसे भूल जाओ, भगवान की यही मर्जी थी", "क्षमाशील बनो", आदि-आदि कह कर हम अब जेल में उस अपराधी को 'पर्याप्त भोजन, दवाइयां, वस्त्र, मनोरंजन' आदि का हक़ देकर उसके 'मानव अधिकारों' के प्रति सचेष्ट हो जाएँ?
मैंने उस किशोर विद्यार्थी से कहा- उस अपराधी ने उस वृद्धा के साथ जो कुछ किया, वह उन क्षणों में किया, जब परिस्थिति-वश वह "कुछ देर के लिए मानव न रहा". उसके मस्तिष्क का एक क्रूर पशु के रूप में रूपांतरण हो गया. ऐसे में उसके पशुत्व को पुनः मानवता में बदला जाना कानून की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए, ताकि भविष्य में और मनुष्य उसकी पशुता के शिकार न बनें . इस प्रक्रिया में उसके इन्सान के रूप में सारे अधिकार उसे दिए जाने चाहिए.साथ ही उसके द्वारा हानि पहुंचाए गए परिवार के कष्टों को मुआवजा, सहानुभूति,न्याय, नौकरी, अन्य-सुविधाएँ आदि देकर सामाजिक व राष्ट्रीय क्षमा उस परिवार से मांगी जाय.
क्या मैंने उस बच्चे से ठीक कह दिया?        

Sunday, December 18, 2011

क्या कुश्ती तीन पहलवानों के बीच भी हो सकती है?

एक साथ तीन पहलवानों के बीच मल्ल-युद्ध की आशंका अब कोई अनहोनी नहीं है. क्योंकि अब ऐसा हो रहा है. ये तीन पहलवान कौन-कौन हैं, आप जानते हैं?
ये पहलवान हैं- गुणवत्ता, संख्या और वर्चस्व.
 वैसे ये पहलवान तो दिखाई देने वाले नहीं हैं? फिर इनकी लड़ाई का आनंद कैसे आएगा?
लेकिन आनंद आ रहा है.
आनंद इसलिए आ रहा है, क्योंकि ये पहलवान दिखाई देने वाला चोला पहन के जंग कर रहे हैं. इनके दिखाई देने वाले नाम हैं- अमेरिका, हांगकांग और जापान.
और लड़ाई का मैदान है तकनीकी बाज़ार. फ़िलहाल ताज़ा स्कोर इस प्रकार हैं- नंबर तीन पर चल रहा है जापान, नंबर दो पर अमेरिका है और पहले नंबर पर हांगकांग को 'माना' जा रहा है.माना जा रहा है, इसलिए कहा गया है, क्योंकि फ़िलहाल विजेता अंकों के आधार पर ही बढ़त पर है, उसने 'रनर्स-अप' को चित्त नहीं किया है.
अब बाज़ार में आप 'अंकों' को कितने अंक देते हैं, ये आप पर निर्भर है.
ये ठीक है कि जो जीता वही सिकंदर,लेकिन जो जीतता दिखे उसे अभी सिकंदर नहीं कहा जा सकता, क्योंकि मामला अभी "अंकों" पर ही है. किसी सांख्यिकी-विद से पूछिए, अंक तो कुछ भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं.भारत में तो ऐसे अनेकों उदाहरण भरे पड़े हैं. यहाँ तो महंगाई "घट" रही है.संपदा बढ़ रही है, लोग गरीब हो रहे हैं.
अब एक सवाल आपके लिए- क्या आप बता सकते हैं कि गुणवत्ता, संख्या और वर्चस्व में से कौन, किस खिलाड़ी के चोले में है? उदाहरण के लिए- दर्शक के चोले में तो भारत है.  

Saturday, December 17, 2011

सूडान और उत्तर प्रदेश की प्रसव पीड़ा का साल

जब २०११ शुरू हुआ था तो अफ्रीका के सबसे बड़े देश सूडान ने सबका ध्यान खींचा था. इस बात पर जनता की रायशुमारी की जा रही थी कि क्या सूडान से दक्षिणी सूडान को अलग करके, एक अलग देश का दर्ज़ा दे दिया जाय.चाहे जन्म न हो, पर ऐसी ही प्रसवपीड़ा भारत का उत्तर प्रदेश राज्य भी झेल रहा है.
उत्तर प्रदेश में तो शीघ्र ही चुनाव भी होने वाले हैं. इन चुनावों में सबसे ज्यादा खींच-तान चार दलों के बीच ही है. सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी और कॉन्ग्रेस.चारों का उत्साह और दम-ख़म देख कर ऐसा लग रहा है कि कहीं चारों ही प्रदेश के चार टुकड़े करके, एक-एक टुकड़ा न ले उड़ें.वैसे यह स्थिति काल्पनिक ही है, पर यदि ऐसा हो जाये तो ये चार राज्य चार देशों जैसे ही हो जायेंगे.
कोई खिलौना अपनी इच्छा से तो टूटना नहीं चाहता. खेलने वाले बच्चे ही उसे तोड़ देते हैं.
इन चुनावों में मुद्दे भी चार ही हैं- विदेशों में जमा काला धन,नोट से वोट, गाँव-गाँव की पद-यात्रायें और भ्रष्टाचार.
संसद ने चार दिन में कुछ नहीं किया तो जैसे क्रिसमस में सांताक्लॉज़ घर-घर  पहुंचेंगे वैसे ही चुनावों में  अन्ना हजारे भी.यह डर सभी को साल रहा है-
          खादी  लपेट-लपेट के  घूमत, वोटन के लिए  नेता  बेचारे
          रोटी भी छोड़ के, बोटी भी छोड़ के, पैदल डोल रहे मारे-मारे
          लूट  के  ढेर के ढेर यहाँ से, धरे  परदेस  में  नोट  करारे
          भ्रष्टाचार की  तान  उठाके, ये  आये  कहाँ  से  अन्ना हजारे?     

शोध

आपको क्या लगता है? शोध शुरू करके उसे लगातार झटपट पूरी कर देने पर नतीजे ज़्यादा प्रामाणिक आते हैं या फिर उसे रुक- रुक कर बरसों तक चलाने पर ही...

Lokpriy ...