Wednesday, August 31, 2011

गणेश ने की मनोकामना पूरी

एक बार एक चूहे की दोस्ती हाथी से हो गई.दोनों पक्के दोस्त बन गए.
कुछ दिन बाद चूहे का जन्मदिन आया.हाथी को जैसे ही पता चला,वह बोला-मैं तुम्हारी बर्थडे पार्टी में ज़रूर आऊंगा.चूहे के पैरों तले ज़मीन खिसक गई.उसने सोचा,मैं अपने छोटे से बिल में इसे कैसे बुलाऊं.वह इनकार कर के दोस्त का दिल नहीं दुखाना चाहता था.फिरभी उसे मन मार कर चुप रह जाना पड़ा.
अगले दिन जब धूम-धाम से पार्टी शुरू हुई,चूहा केक काटने चला.उसने मोमबत्ती जलाने के लिए जैसे ही माचिस जलाई अचानक धुंए के साथ जोर से छींक की आवाज़ आई,और चूहा सब दोस्तों के साथ बिल से बाहर आया.वह ये देख कर ख़ुशी से झूम उठा कि उसके दोस्त हाथी ने आकर बिल पर सूंड रख दी थी.और धुंए से आई छींक ने दोस्तों को मिला दिया.
उसी दिन से चूहे ने हाथी को अपनी पीठ पर बैठा कर चलना शुरू कर दिया.

Tuesday, August 30, 2011

देखें कि गलत नंबर डायल न हो

सन २०२५ आपको यह ऑप्शन दे देगा.आप अपने घर की छत पर जाइए,पूरे शरीर पर हेलमेट की तरह बॉडी-कैप्सूल पहनिए,फिर एक मेज़ पर रखे डायल-बॉक्स में अपनी मनचाही छत का नंबर डायल कर दीजिये.और बैठ जाइये पास में लगी तोपनुमा कुर्सी पर.एक क्लिक के साथ आप "शूट"होकर अपने गंतव्य तक पहुँच जायेंगे.उतारिये हेलमेट और कीजिये अपना काम.
बड़े शहरों में दफ्तर आने-जाने का यह भरोसेमंद और सस्ता साधन होगा.

Monday, August 29, 2011

नजर,नक्षत्र,नसीब कौन से जहाँ की बातें हैं?

दर्ज़नों मवेशी हरे-भरे मैदान पर शांति से चर रहे थे.अचानक एक बाघ आ गया.भगदड़ मच गई.वह बाघ एक निरीह बेक़सूर बछड़े को उठा ले गया.सब देखते रह गए.बछड़े का नसीब.
दर्ज़नों लोग घर में सोये हुए थे.अचानक छत से एक पत्थर गिरा,और कोने में सोये एक बुज़ुर्ग पर आ लगा.उनके प्राण-पखेरू उड़ गए.उनके नक्षत्र ऐसे ही चल रहे थे.
बालक ने स्कूल के मंच पर इतना सुन्दर नृत्य किया, कि सब देखते रह गए.लेकिन घर आते ही वह बीमार हो गया.माँ कहती है कि उसे नज़र लग गई.
क्या आपके पास इन स्थितियों से बचने का कोई उपाय है? यदि है,तो उसे ज़ाहिर कीजिये.बताइये.

एक बार फिर कुदरत ने हमसे चाहा उसकी सर्वोच्चता का सम्मान

अमेरिका में आये तेज़ चक्रवात,वर्षा और अंधड़ ने पिछले दिनों स्तब्ध कर दिया. प्रकृति के तांडव को किंकर्तव्य विमूढ़ता से देखने का कहीं कोई विकल्प नहीं था.हमारा देश होता तो जो कुछ होना था,हो चुकता और तब हमें पता चलता.पर वह अमेरिका है,प्रकृति ने उसे नोटिस दिया.उस महान देश ने भी पूरे सामर्थ्य से विभीषिका से निपटने में अपनी तैयारी का साहसिक प्रदर्शन किया.लाचारी को न्यूनतम कर लेने के उस ज़ज़्बे को सलाम.सुरक्षा सावधानी और आपदा-प्रबंधन ही वह श्रीफल है जिसे हम कुदरत के कोप के समक्ष चढ़ा सकते हैं.

Wednesday, August 24, 2011

क्या आप बता सकते हैं कि गलती किस की है?

एक तरफ एक स्वीमिंग पूल है,दूसरी ओर छोटा सा मैदान. मैदान में दस बच्चे खड़े हैं.स्वीमिंग पूल पर एक चौकीदार है.उसे सख्त हिदायत है कि वह केवल उन्ही बच्चों को पूल में नहाने दे,जो तैरना जानते हों.मैदान पर एक प्रशिक्षित युवक है,जिसे निर्देश है कि वह बच्चों को तैरना सिखाये.बच्चे अभी तैरना नहीं जानते.कुछ दूरी पर एक कक्ष में एक अधिकारी है,जिसे हर प्रकार से स्थिति पर नियंत्रण के लिए वहां तैनात किया गया है.
कुछ देर में ही अधिकारी के कक्ष में शिकायतों का सिलसिला शुरू होता है.कुछ बच्चे आकर कह रहे हैं कि चौकीदार उन्हें नहाने नहीं दे रहा.चौकीदार कई बार आकर कह चुका है कि बच्चे नहीं मान रहे,शैतानी करते हैं.युवक आकर कह रहा है कि चौकीदार अड़ियल है,उसे पता ही नहीं है कि स्वीमिंग-पूल किस काम आता है?बच्चों को यह भी बात  समझ में नहीं आ रही कि उन्हें तैरना क्यों नहीं सिखाया जा रहा?अधिकारी की विवशता यह है कि किसी के निर्देश बदले नहीं जा सकते,क्योंकि अंतिम निर्णय करने वाले मालिक उपस्थित नहीं हैं.
सब अपने-अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं,फिर भी असंतोष है.क्या आप इस स्थिति में कोई ऐसा सुझाव दे सकते हैं कि असंतोष कम हो.

Saturday, August 20, 2011

ममतामय-बैंड की पहली थाप

शायद हमारी नई पीढ़ी यह नहीं जानती होगी कि लॉर्ड रामा का असली नाम 'राम' था. आज का लोकप्रिय वेस्टर्न योगा भी कभी 'योग' नाम से हमारे देश की जीवन-शैली का हिस्सा था.
हमारे देश के कुछ राज्य ऐसे हैं,जिनकी दिलचस्पी देश की मुख्य धारा में कभी नहीं रही.उन्हें हमेशा अपना अलग राग गाते देखा गया.जब सारा देश हिंदी की बात कर रहा था,वे 'अपनी भाषा' की बात कर रहे थे.जब देश समाजवाद  की सोच रहा था वे साम्यवाद का झूला झूल रहे थे.जब देश अहिंसा की बात कर रहा था,वे खंजर पैना कर रहे थे.कहने का मतलब यह है कि उन्हें इंडिया की शर्तों पर चलना मंज़ूर नहीं था,बल्कि वे चाहते थे कि इंडिया उनकी शर्तों पर चले.खैर,इंडिया के संविधान में यही लिखा भी था कि कोई सुर कितना भी बेसुरा हो,उसे दबाया नहीं जायेगा.
चंद दिनों बाद हमारा पश्चिम बंगाल 'पश्चिम बंग' हो जायेगा.निश्चित ही इस नए चोले का नाम आम रिवाज के अनुसार हिंदी में नहीं,अंग्रेजी में लिखा जायेगा,और फिर इसे बंग से बांग होते देर नहीं लगेगी.हमारे अशिक्षित,अल्प-शिक्षित,अर्ध-शिक्षित तो इसे हिंदी में बंग कह भी लेंगे,पर उच्च-शिक्षितों को बांग और बेंग कहने से कौन रोकेगा?
अतः देश के तमाम मुर्गों को बधाई,कि उनकी आवाज़ अब जल्दी ही घर-घर गूंजने वाली है.ममता-बैंड की पहली तान मुबारक.
वैसे मुर्गे भाषा से प्रभावित नहीं होते.वे उसी दूकान के सामने दिन-भर सीना फुला कर घूमते पाए जाते हैं,जिस पर लिखा होता है-"यहाँ मुर्गे का ताज़ा मीट हरसमय उपलब्ध है ".

Friday, August 19, 2011

अपने पिता को पैदा करने का ख्वाब

रोटी कपड़ा और मकान किसी ज़माने में इंसान के लिए मूलभूत ज़रुरत माने जाते थे. जिसे ये तीनों चीज़ें मिल जाएँ, उसका दर्ज़ा संतुष्ट आदमी का माना जाता था.
आपको लग रहा होगा कि यह तीनों चीज़ें तो अब भी मौलिक आवश्यकता हैं. नहीं,रोटी अब करोड़ों घरों की रसोई से निकल गई है.कई लोगों के नसीब से निकल गई है.मज़े की बात यह है कि ऐसे लोग रोटी के लिए नहीं तरस रहे,बल्कि रोटी ही उनके लिए तरस रही है.यह भुखमरी का मामला नहीं है,बल्कि सम्पन्नता की बात है.कपड़ा भी शौक की बात बन गया है.तन ढकने के लिए कोई नहीं पहनता,तन उभारने के लिए चाहिए. और मकान? वह अब सर छुपाने की जगह नहीं है,खरीदने-बेचने और मुनाफा कमाने का जरिया है.
तो फिर मूल ज़रूरतें क्या हैं?
एक राजा के चार पुत्र थे.राजा ने एक दिन बैठे-बैठे उनसे पूछ लिया- तुम मुझसे क्या चाहते हो?बारी-बारी से बताओ.सबसे बड़ा बेटा बोला-कोई ऐसा बंदोबस्त कर दीजिये, कि ज़िन्दगी भर रोटी मिलती रहे.राजा जवाब से काफी प्रसन्न हुआ.दूसरा बेटा बोला-कोई शानदार सी राजसी पोशाक दीजिये.राजा को अच्छा लगा. तीसरे पुत्र ने कहा-आपसे एक शानदार महल मिल जाये तो आनंद आ जाये.राजा आनंद से भर गया. 
अब सबसे छोटे पुत्र की बारी थी.वह बोला-मैं चाहता हूँ कि अगले जन्म में आप मेरे पुत्र के रूप में पैदा हों.राजा क्रोध से आग-बबूला हो गया.बोला-मूर्ख,मैं तुझसे कुछ मांगने को कह रहा हूँ,और तू मुझे जन्म 'देने' की बात करता है?
मूलभूत ज़रूरतें न रहें तो आदमी खुराफातें सोचता है.और अगर सोचने की शक्ति खो दे तो मूलभूत ज़रूरतें खो देता है,आज के इंसान की तरह.

शोध

आपको क्या लगता है? शोध शुरू करके उसे लगातार झटपट पूरी कर देने पर नतीजे ज़्यादा प्रामाणिक आते हैं या फिर उसे रुक- रुक कर बरसों तक चलाने पर ही...

Lokpriy ...