Wednesday, December 2, 2015

यदि कर सके तो सरकार ये कर दे !

इस समय माहौल बहुत अच्छा है। 
देश के अधिकांश बुद्धिजीवी, साहित्यकार, कलाकार, संत,विचारक आदि अपने सब दैनिक क्रियाकलाप छोड़ कर "सूरज को देखते हुए सूरजमुखी फूल" की भांति केवल मोदीजी और केंद्र सरकार को ही देख रहे हैं। ये आपको बताते हैं कि सरकार ने क्या नहीं किया, क्या-क्या गलतियां कीं, प्रधानमंत्री कहाँ गए, कहाँ नहीं गए, उन्होंने क्या पहना, क्या पहनना छोड़ दिया, क्या खाया, किसके साथ खाया, क्या बोले, क्यों बोले, क्यों नहीं बोले... आदि। 
सरकार उनकी इस सक्रियता का सकारात्मक लाभ क्यों न ले?
प्रत्येक जिला अधिकारी के कार्यालय में एक बोर्ड और मार्कर रखवा दे, और बुद्धिजीवियों का आह्वान करे कि वे जब चाहें, यहाँ आकर बोर्ड पर लिख जाएँ कि सरकार ने क्या गलत किया, या वो क्या करे?
आवश्यक हो तो सरकार इसके लिए उन्हें आने-जाने का किराया-भत्ता भी दे। जनसम्पर्क विभाग रोज इस बोर्ड की सामग्री स्थानीय अख़बारों को उपलब्ध करवा दे.   
बोर्ड पर शीर्षक हो- "क्या कहते हैं देश/समाज के हितैषी?"

ये चुनौती है

 एक समय था जब हमारे देश का तमाम कामकाज अंग्रेजी में चलता था,उस समय अधिकांश भारतवासी कुछ भी समझ नहीं पाते थे.
किन्तु अब राजभाषा कर्मियों के निरंतर प्रयास से यह दिन आ गया है कि अब काफी कामकाज हिंदी में भी होने लगा है.लेकिन इसके भी अपने नुकसान हैं.अब कई अंग्रेजीदां लोग इसे समझ नहीं पाते.
 हिंदी के तमाम शिक्षकों और विशेषज्ञों के लिए इस समय एक बड़ी चुनौती है। उन्हें या तो "मुहावरों" को सुधारना होगा, या फिर बिलकुल हटा देना होगा।
होता ये है कि कोई मुहावरा बोला जाता है, यथा -"धोबी का कुत्ता,घर का न घाट का"
इसका अर्थ है कि व्यक्ति दो काम करने चला पर कोई भी पूरा नहीं कर पाया."हाथी निकल गया, कुत्ते भौंकते रह गए" का अर्थ है व्यक्ति ने आलोचना की परवाह किये बिना अपना काम कर लिया.
किन्तु हमारी संसद में यदि कोई हिन्दीभाषी ये मुहावरा बोलता है तो उसे समझे बिना कहा जाता है-"हमें कुत्ता कह दिया, हमें हाथी बता दिया"
और इस तरह जो बात 'हिंदी के प्राथमिक ज्ञान' की है उसे "असहिष्णुता"का मुद्दा बता कर संसद ठप्प कर दी जाती है.
मज़ा ये, कि संसद ठप्प करने वाले कभी ये नहीं कहते कि हमने आज न काम किया, न औरों को करने दिया, अतः हमारे वेतन-भत्ते काट लो !    

Tuesday, December 1, 2015

अद्भुत ! आश्चर्यजनक !

आजकल एक बड़ी मज़ेदार चीज़ देखने को मिल रही है। 
वर्षों से हम जिन लेखकों और साहित्यकारों को पढ़ और सराह रहे थे,उनमें से कई आज अपनी पूरी ताकत केवल वर्तमान सत्ता को कोसने, विरोध करने, मज़ाक उड़ाने और उस पर तरह-तरह की टिप्पणी करने में लगाए हुए हैं.
ऐसे-ऐसे नामी संपादक जिन्हें किताबों और पत्रिकाओं के प्रूफ देख पाने तक का समय नहीं मिलता था, वे मोदीजी के भाषण, उक्तियाँ,उच्चारण,पहनावे, कार्यकलाप, भारतीय जनता पार्टी के कार्यों, कार्यक्रमों पर इस तरह टकटकी लगाए हुए हैं जैसे इनका जन्म ही इस काम के लिए हुआ है.देश की जिस जनता ने ३०० सीटें देकर इस दल को सत्तासीन किया है, उसके समर्थकों के लिए भी इन्होंने तरह-तरह के नाम ईज़ाद कर लिए हैं और ये रात दिन, सोते जागते, उठते बैठते केवल यही देख रहे हैं कि मोदीजी पल-पल क्या कर रहे हैं !
किसी समय आपातकाल के बाद इंदिराजी को भी ऐसा ही सौभाग्य मिला था कि हर आदमी उनकी ही बात कर रहा था, चाहे उनके पक्ष में, चाहे उनके विरोध में.शायद वे इसी कारण आराम से दोबारा सत्ता में आई थीं.
लगता है अगले चुनाव में बीजेपी को अपना प्रचार करने की ज़रूरत बिलकुल नहीं पड़ेगी, वो इन "बुद्धिजीवियों" के रात-दिन के भजनालाप से ही जीत जाएगी ! 

Monday, November 30, 2015

क्या हमें अपने से भी ज़्यादा भरोसा पाकिस्तान पर है?

भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाड़ी आपस में मैच खेलें या नहीं?
इन दोनों देशों के बीच संभावित खेल को लेकर हमारा देश एक मत नहीं है। कुछ लोग मानते हैं कि खेल हो, और राजनीति या कूटनीति को खेल के मैदान से दूर रखा जाये।  जबकि कुछ लोग सोचते हैं कि यदि पाकिस्तान भारत के साथ दुश्मनी का व्यवहार करता है तो उसके साथ खेलने का क्या औचित्य? वहीं ऐसा विचार रखने वाले कुछ लोग भी हैं कि आज की दुश्मनी को मिटाने की जब कूटनीतिक कोशिशें हो रही हैं तो सौहार्द्र की एक कोशिश खेल के जरिये भी क्यों नहीं? खिलाड़ियों और खेल- प्रेमियों की राय यह है कि देशों की सरहद बांटना हुक्मरानों का काम है, मानवीय आधार पर खेल की भावना तो बनी ही रहे।
तात्पर्य यह है कि एक ही मुद्दे पर हम अलग-अलग राय रखते हैं और अपने-अपने हिसाब से एक्शन चाहते हैं।
तो क्या पाकिस्तान को हम एड़ी से चोटी तक "एक" ही मानते हैं? क्या वहां सत्ता, विपक्ष, अवाम, खेल प्रशासन और खिलाड़ी,सबका हम परस्पर जुड़ाव या एकजुटता मानते हैं?
क्या हमारे यहाँ जो सत्ता कहती है, विपक्ष, जनता, खेलसंघ, खिलाड़ी और खेलप्रेमी वही करते हैं?
यहाँ तो आधे से ज्यादा लोग ये शपथ खाए बैठे हैं कि जो केंद्र सरकार करे, उसका उल्टा बोलना है !चाहे वह जनता के स्पष्ट बहुमत से चुनी हुई बिना किसी जोड़गांठ, उठा-पटक,खींचतान वाली सरकार हो।
आखिर साठ साल तक खाया हुआ नमक भी तो कुछ वजन रखता है?  

     

Friday, November 27, 2015

           

युद्ध स्तर पर लड़ने की ज़रूरत है इस से

भारत की आज सबसे बड़ी समस्या शायद जनसंख्या का दबाव ही है। हम अपने सवा अरब देशवासियों पर बेशक गर्व करना न छोड़ें, किन्तु ये बात भी न भूलें कि  -
१. हमारी अधिकांश महत्वाकांक्षी परियोजनाएं बेतहाशा बढ़ते जनसंख्या दबाव के चलते संकट में पड़ जाती हैं।
२. विशाल जनसंख्या में एक बड़ा हिस्सा अनुत्पादक जनसंख्या का है, जो अर्थव्यवस्था पर भार की तरह है।
३. यदि हम "जनसंख्या किस्म" की बात करें तो इसमें निरंतर ह्रास हो रहा है क्योंकि वे लोग ही तेज़ी से बढ़ रहे हैं जो शिक्षा या प्रचार के दायरे में नहीं आ पाते।
४. संख्या नियंत्रण के लिए कुछ कड़े फैसले लिए बिना काम नहीं चलता,और कोई भी ऐसा फैसला विविध-सोच वाले देश में आसान नहीं होता।
५. यह सच है कि बेहद व्यापक हो चुकी "नशाखोरी" ने हमारी जनसंख्या के बड़े हिस्से को नाकारा बना छोड़ा है।
 ६.तथाकथित असहिष्णुता भी भीड़ की एक प्रवृत्ति है, और हर जगह, हर बात में भीड़ होना, जनसंख्या की ही देन है।     
७. हम बाहर से हमारे पास आये लोगों को अपना नहीं समझ पाते इससे वे हमारे पास तो हैं, पर हमारी मानसिक आयोजना में शामिल नहीं हैं।       

Thursday, November 26, 2015

प्रकृति मै ' म [ कहानी- अंतिम भाग (5) ]

मैडम बोलीं- गौरव, बेटा इस ग्रुप में अब बहुत बच्चे हो गए हैं, तुम कल से दोपहर वाले बैच में आया करो।
गौरव ने मुंह में भरा पानी पिचकारी की शक्ल में ऐसे उछाला जैसे नौसिखुए सिगरेट पीने वाले धुआं एक ओर मुंह करके उड़ाते हैं।  फिर धीरे से बोला- जी मैम !
कोच उसके कॉस्ट्यूम की ओर गहराई से देखती हुई झेंप कर रह गयी।
गौरव ने चुपचाप पास की बेंच पर रखा अपना तौलिया लेकर कंधे पर डाला और धीरे-धीरे वाशरूम की ओर बढ़ गया।
मैं  शायद सीढ़ियों की ओर नीचे होने के कारण ऊपर उन लोगों को दिखाई नहीं दिया था लेकिन उनकी आवाज़ मुझ तक साफ-साफ आ रही थी।
बच्चे गौरव को जाते हुए देखते रहे, तभी पीछे से पानी के बीच से अविनाश की आवाज़ आई,जो गौरव से कह रहा था- ... तुम अब ठड़े होने वाले वाशरूम में जाना ...टल से.... ठीट है डौरव ?
बच्चों ने देखा गौरव मुस्कराकर पलटा और फिर बब्बर शेर वाली चाल से चलता हुआ शान से भीतर चला गया।  कोच ने मुझे देख लिया था और वे अभिवादन कर मेरी ओर चली आयीं।
मैं बच्चों को अठखेलियां करते देख रहा था कि तैरते हुए अविनाश की आवाज़ आई- डुरुजी ....नमस्टार !
मैं सोच रहा था, हम तो नाम के शिक्षक हैं बाक़ी असली शिक्षिका तो प्रकृति है जो अपने तरीके से ज़िंदगी के सबक हम सबको सिखाती है।  [ समाप्त ]
[ "सुजाता" सितम्बर 2015 अंक में प्रकाशित ]    

शोध

आपको क्या लगता है? शोध शुरू करके उसे लगातार झटपट पूरी कर देने पर नतीजे ज़्यादा प्रामाणिक आते हैं या फिर उसे रुक- रुक कर बरसों तक चलाने पर ही...

Lokpriy ...