Wednesday, November 25, 2015

तब क्या होगा?

आज हमारे पास टीवी देखने के लिए ढेर सारे चैनल्स हैं। इनमें बहुत विविधता भी है। कहा जाता है कि आप जो कुछ देखना चाहें वही उपलब्ध है। मनोरंजन की दुनिया में यह उपलब्धि ही है।
लेकिन यह भी सत्य है कि आज मनोरंजन के ये स्टेज भी विचारधाराओं से ग्रसित हैं।
यदि आपका प्रवेश इन अलग-अलग चैनल्स में अबाधित है तो ये आपके लिए ज्ञान और स्वस्थ मनोरंजन का जरिया हो सकते हैं। आप अपने मूड और समय के मुताबिक मनमाफिक कार्यक्रम देख सकते हैं।
लेकिन अगर आपको मितव्ययता के कारण इनमें से अपनी पसंद के चंद चैनल्स चुनने के लिए कहा जायेगा, तो एक आशंका है। यदि आपने समाचार चैनलों का चयन सावधानी से नहीं किया तो हो सकता है कि आप जबरन एकतरफ़ा सोच के शिकार बना दिए जाएँ।
बड़ी संख्या में समाचार चैनल्स आज आपके लिए  'ब्रेनवाश' करने की कोशिश करने वाले आक्रामक हमलावर बनते जा रहे हैं।  कुछ तो ऐसे हैं कि जिन्हें देखते हुए आपको ये साफ लगेगा कि  यदि आपने इनकी बात नहीं मानी तो इनके प्रस्तुतकर्ता परदे से निकल कर आपसे झगड़ा करने लगेंगे।
देश में फैलती सहिष्णुता-असहिष्णुता की रस्साकशी में इनकी भूमिका कितनी है, ये नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
            

Monday, November 23, 2015

सहिष्णुता या असहिष्णुता आपके अपने भीतर है !

हवा न चले तो पतंग नहीं उड़ती, पतंग बेचने वाले भी मायूस हो जाते हैं।
हवा चले तो पतंग लहराती है। पतंगें उड़ें तो पेंच लड़ते हैं।
पेंच लड़ें, तो एक पतंग कटती है, एक काटती है।
कटने वाला मायूस,काटने वाले के मज़े।
हमेशा एक की ही पतंग कटे तो वह उड़ाना छोड़ देगा।
काटने वाले के मज़े भी ख़त्म! अकेला उड़ाता रहा तो ऊब कर वह भी उतार लेगा।
अतः मज़ा पेंच लड़ाने में ही है, हारने-जीतने में नहीं।
जीत जाएँ तो आनंद उठाइये, हार जाएँ तो जीतने का इंतज़ार कीजिये।
 
 


     
    


Thursday, November 19, 2015

ये भी है नए समय की एक विशेषता

एक समय था जब जीवन के किसी भी क्षेत्र के बारे में बात करते समय कहा जाता था कि "इस में राजनीति नहीं", अर्थात राजनीति केवल राजनीति में ही होती थी। खेल,साहित्य,शिक्षा,फिल्म, विज्ञान,कला आदि क्षेत्रों में इसका प्रवेश वर्जित था।
लेकिन आज ठीक इसका उल्टा है। आप बिना राजनीति के आज किसी से, किसी भी मुद्दे पर बात कर ही नहीं सकते।  आप चाहे कर भी लें ,पर सामने वाला आपकी बात को बिना राजनीतिक परिप्रेक्ष्य के ग्रहण कर ही नहीं पायेगा।
इसका कारण बहुत स्वाभाविक है।
आज़ादी के आधी सदी बाद तक हमारे यहाँ एक ही सोच की सत्ता रही। उसके बाद का समय उथल-पुथल का रहा। कभी तू, कभी मैं। ऐसे-ऐसे अजीबोगरीब गठजोड़ होते रहे जो किसी नौटंकी से भी ज़्यादा मनोरंजक होते थे। एक दूसरे को गरियाते-लतियाते चुनाव लड़ते, और बाद में एक-दूसरे से गले मिल कर कुर्सी पर आसीन हो जाते। सालों बाद देश में जनता ने करीने से किसी एक विचार को केंद्रीय सत्ता सौंपी।
हर समय समाज या देश में मूलतः दो वर्ग होते हैं- "हैव्स और हेवनॉट्स" यानी एक, जिस के पास है और दूसरा, जिसके पास नहीं है। वैचारिकता के परिवर्तन से जिनके पास था, उनसे खिसक कर दूसरे के पास जाने लगा।  
अब सावन के अंधे की भांति एक वर्ग को अपनी हरियाली की आदत है, वह दूसरे वर्ग को फलते-फूलते देख कर सहन नहीं कर पाता और बात-बेबात "असहिष्णुता"राग आलापता है। यह नहीं समझ पाता कि ये तथाकथित असहिष्णुता उसकी अपनी ही है।
हाँ, एक लम्बा-चौड़ा तीसरा वर्ग भी है, जो पहले भी खा रहा था, अब भी खा रहा है। चलिए, फ़िलहाल उसके वाशिंदों को सामान्य आदमी नहीं मानते।   
                  

आपभी नाप सकते हैं असहिष्णुता

आजकल भारत में असहिष्णुता पर एक खास किस्म की बहस चल रही है। इस बहस में हिस्सा लेने के लिए मीडिया के विभिन्न चैनलों पर उन लोगों को आमंत्रित किया जाता है, जो किसी भी मुद्दे पर सहिष्णु नहीं हों। क्योंकि यदि वे सहिष्णु होंगे तो वे चर्चा के दौरान मुंह भी नहीं खोल पाएंगे। असहिष्णु लोगों द्वारा तेज़ आवाज़ में, जल्दी-जल्दी इस तरह चर्चा करनी होती है कि एक बार शुरू होने पर किसी के भी रोके से आप न रुकें,और केवल मुद्दे की बात को छोड़ कर बाकी सब कुछ बिना रुके कहते रह सकें।आप इतने तन्मय होकर चीखें कि आपके सामने से माइक अथवा कैमरा हटा लिए जाने का भी आप पर असर न हो। सहिष्णु लोगों को यह अभ्यास नहीं होता।
आइये देखें, कि असहिष्णुता कैसे लायी जाती है, और कितनी?
आजकल प्रचलित परम्परा के अनुसार किसी भी समाचार चैनल के पास प्रति दस मिनट में से आठ मिनट विज्ञापनों के लिए तथा दो मिनट समाचारों के लिए उपलब्ध होते हैं।  कर्णभेदी मधुर पार्श्वसंगीत के साथ चैनल के पहचान चित्र-जंजाल और बोधवाक्य के लिए तीस-चालीस सैकंड का समय भी इन्हीं दो मिनट में से निकालना होता है। क्योंकि आठ मिनट के विज्ञापन तो वैसे भी साढ़े आठ मिनट ले लेते हैं।
अब आपको दो मिनट में पिच्चासी ख़बरों का रसास्वादन कराया जाना है, स्टार्ट ....
१. बॉलीवुड की मशहूर आयटम गर्ल ने किया जुहू-बीच पर डांस
२. नाचीं हरी चुनरी में
३. दुपट्टा था हल्का पीला
४. 'क' दल के एक नेता ने दिया विवादास्पद बयान
५. साक्षात्कार में कहा- हम नहीं देखते नचनियां का नाच
६. 'ख' दल के प्रवक्ता ने इसे नृत्यकला का अपमान बताया
७. सुदूर प्रान्त की राजधानी में एक राजनर्तकी ने कुपित होकर लौटाया उन्हें मिला सम्मान
८. राजनर्तकी के समर्थन में उतरे मृदंग वादक
९. 'ग' दल ने शहर के मुख्य मार्गों से नगर कोतवाल की कोठी तक कलाकारों के साथ मार्च-पास्ट किया
१०. शहर के मशहूर कालेज में इस असहिष्णुता पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित
११. 'घ'दल ने की इस मुद्दे पर सरकार के इस्तीफ़े की मांग
बस, इसके बाद आपने टीवी ऑफ़ कर दिया। तो आपकी असहिष्णुता हुई-"सौ प्रतिशत"[आप राष्ट्र की रंग-रंगीली हलचल को सह नहीं न पाये!]
                    

Thursday, October 29, 2015

ये अच्छा है या बुरा?

जब किसी दर्द के इलाज के लिए आप डॉक्टर के पास जाते हैं, तो डॉक्टर इलाज से पहले आपके दर्द वाले स्थान को हिलाकर , सहलाकर , दबाकर , पकड़कर या  खरोंच कर और बढ़ा देता है।
इस समय रोगी की मनोदशा सतरंगी हो सकती है-
१. ये दर्द मिटा रहा है या और बढ़ा रहा है?
२. इसे कुछ समझ में ही नहीं आ रहा, क्या इलाज करेगा?
३. ध्यान से देख तो रहा है, निदान करेगा।
४. हिसाब लगा रहा है, कौन-कौन से टेस्ट कराये जा सकते हैं?
५. बढ़िया डॉक्टर है।
६. पड़ौसी ठीक कहता था, ज़रा समय लगाएगा पर दर्द छूमंतर कर देगा।
७. इसका तो हाथ लगते ही दर्द गायब हो गया?
रोगी कोई भी हो सकता है-इंसान, जानवर या देश !   

Sunday, October 25, 2015

"हरी-नीली-पीली-गुलाबी पतंगें"

कल मुझे एक छात्र ने पूछा-"सर, मकरसंक्रांति पर जयपुर में तो बहुत पतंगें उड़ती हैं, आप जयपुर में ही पढ़े, क्या आप भी पतंगें उड़ाते थे?"
उसे दिया गया जवाब आपके लिए भी-

हरी नीली पीली गुलाबी पतंगें
न जाने मगर कौन सी अब कहाँ है?

किसी-किसी के रंग, लगते सजीले
किसी-किसी के अंग,होते नशीले
किसी-किसी के तंग, थे ढीले-ढीले
तरसाती थीं दूर से भी पतंगें !

इन्हें देखते छत पे आते थे लड़के
गली में मिलीं, लूट लाते थे लड़के
पकड़ डोर जबभी, हिलाते थे लड़के
धरा से गगन पे, जातीं पतंगें !

कोई दोस्तों से मिलके उड़ाता
कोई लेके इनको,अकेले में जाता
सभी का मगर इनसे कोई तो नाता
होतीं सभी की मुरादें पतंगें !

पड़ता था घर के बड़ों को मनाना
कहते थे बाबा, थोड़ी उड़ाना
जैसा हो मौसम उसी से निभाना
देती हैं भटका,ज़्यादा पतंगें ! 





Wednesday, October 7, 2015

मासूम सादगी

कुछ लोग "साहित्य अकादमी" द्वारा दिए गए सम्मानों को वर्षों बाद वापस लौटा रहे हैं। आइये देखें, कि वे जाने-अनजाने अपनी मासूमियत में क्या कह रहे हैं? अर्थात इसके क्या निहितार्थ हैं?
-वे कह रहे हैं कि उन्हें पुरस्कार/सम्मान उनकी रचनाओं पर नहीं मिला, बल्कि इसलिए मिला है, क्योंकि उस समय की सरकार और नेता अच्छा काम कर रहे थे।
-साहित्य के पुरस्कार साहित्य के विशेषज्ञ, समालोचक तथा वरिष्ठ साहित्यकर्मी नहीं तय करते बल्कि सत्ता में बैठे हुए नेता तय करते हैं।
-अब वे अपमानित महसूस कर रहे हैं क्योंकि 'अब सत्ता में उनका कोई नहीं' है।

"लौटा रहे हैं 'मान' वे, सत्ता को कोस कर
लगता है उनके मान में, सत्ता का हाथ था"

तो अब वे सरकार के नयनों के तारे नहीं रहे।       

शोध

आपको क्या लगता है? शोध शुरू करके उसे लगातार झटपट पूरी कर देने पर नतीजे ज़्यादा प्रामाणिक आते हैं या फिर उसे रुक- रुक कर बरसों तक चलाने पर ही...

Lokpriy ...