Friday, May 9, 2014

रखना है कहीं पाँव तो रखते हैँ कहीँ हम, आखिर तो एक इंसान [आम] हैं, फरिश्ता तो नहीं हम

हमारी संस्कृति की खासियत है कि हम मन ही मन जो चाहें, वो सबके सामने न कहें। बल्कि कुछ लोग तो इस रूढ़ि के इतने क़ायल हैं कि जो चाहें , बार-बार ठीक उसका उल्टा कहें।
हमारी फिल्मों ने भी हमें यही सिखाया है, कि जो कहा जाएगा, वह होगा नहीं।
जब कोई नायिका कहती है "तुम मुझसे दूर चले जाना ना" , इसका अर्थ है कि वह शीघ्र ही बिछड़ने वाली है।
जब वह नायक से पूछती है "तारीफ़ करोगे कब तक", और नायक कहता है "मेरे सीने में साँस रहेगी तब तक", तो इसका मतलब है कि फ़िल्म में इंटरवल के बाद दूसरी हीरोइन आने वाली है।
यदि नायक भाव-विभोर होकर कह रहा है "तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है" तो यकीन जानिये कि नायिका थोड़ी देर में अंधी होने वाली है।
यह मानसिकता हमारे देश के आम आदमी की भी है,शायद इसीलिए आम आदमी पार्टी का पदार्पण राजनीति में यही कहते हुए हुआ था कि वे न किसी से समर्थन लेंगे और न देँगे। फिर खुलेआम जो हुआ, वो सबने देखा। ये सिद्ध मंत्र और भी कई पार्टियोँ के नेता और नेत्रियां भी आजकल जप रहे हैं। ईश्वर उन्हें कम से कम तब तक तो अपनी बात पर कायम रहने की शक्ति प्रदान करे, जब तक वे खुद कुछ नया नहीं कह लेते।
वैसे हो सकता है कि किसी को किसी की ज़रुरत ही न पड़े।  

                     

Thursday, May 8, 2014

सबको कुर्सी नहीं चाहिए

भारतीय चुनावी परिद्रश्य देख कर कहा जा  रहा है कि यह घमासान "कुर्सी" के लिए है। लेकिन कुर्सी सबकी हसरत नहीं होती , क्योंकि कुर्सी जिम्मेदारी है, कुर्सी क्षमता है, कुर्सी जवाबदेही है।
अधिकांश उम्मीदवारों के पास न ये क्षमता है, न ये भावना।
यहाँ जिसे जो चाहिए, वह मिल जायेगा।  आइये देखें, किसे क्या चाहिए-
-कुछ लोग केवल इसलिए मैदान में हैँ कि इस उठने-बैठने से उन्हें कुछ पैसा मिल जाये।
-कुछ लोग इसलिए हैं कि उन्होंने कमा-कमा कर जो ढेर लगा लिया  है वह काम आ जाए।
-कुछ लोग इसलिए ताल ठोक रहे हैँ कि दूसरा कुर्सी पर बैठ कर काम करे, और हम उसपर छींटाकशी-नुक्ताचीनी करें।
-कुछ लोग चाहते हैं कि काम करने वाला मिल जाय, हम केवल "ताज" संभालें।
-कुछ इसलिए भी हैं कि मीडिया की सुर्खियों में थोड़े दिन आनंद लिया जाय।
-निस्संदेह,कुछ इसलिए हैं कि देश को जिस दिशा में ले जाना चाहते हैं उसके लिये सामर्थ्य मिले।              

वे स्टार्टिंग पॉइन्ट पर नहीं थे किन्तु अब विक्ट्री स्टैण्ड पर पहुँचते दिख रहे हैं।

कुछ लोगों में रंग बदलने की प्रवृत्ति बड़ी जबर्दस्त और स्वाभाविक होती है।  जैसे सब्ज़ियों में मिर्ची, जैसे फ़लों में  ख़रबूज़ा, जैसे जानवरों में गिरगिट, वैसे ही इंसानों में वे।
वैसे "बदलना" कोई नकारात्मक प्रवाह नहीं है। बल्कि इसके उलट ये ताज़गी, प्रगतिशीलता और नवोन्मेष का प्रतीक ही है।  यह वांछित भी है।  लाखों वैज्ञानिक, चिंतक, लेखक, कलाकार जीवन में बदलाव के लिये निरन्तर कार्यरत हैं, और उनकी उपलब्धि यही है कि उनके प्रामाणिक सिद्ध प्रयोग हमें बदलें।
लेकिन बदलाव में नकारात्मकता यही है कि हम अपने स्वार्थ के लिये बदलें।  यह अवसरवादिता है।  दूसरों की उपलब्धि को अपने खाते में डाल कर जो संतोष हम कमाते हैँ, वह नकारात्मक है।
केवल एक सप्ताह बाद हम ऐसे कई लोगों से मिलेंगे जो तालियों की गड़गड़ाहट के बीच दौड़ जीतने का लुत्फ़ उठा रहे होंगे, क्या हुआ जो वे अभी दौड़ नहीं रहे।         

Wednesday, May 7, 2014

और वह इतिहास में सच्चे जानवर के रूप में अमर हो गया

  एक शेर था।  एक दिन बैठे-बैठे उसे ये ख़्याल आया कि उसने हमेशा जंगल के प्राणियों को मार कर ही खाया है, कभी किसी का कुछ भला नहीं किया। इंसान हो या जानवर, कुछ भला काम करने की  इच्छा तो कभी-कभी जागती ही है।  अतः उसने भी सोचा कि अब से मैं केवल सत्य ही बोलूंगा।
सवाल ये था कि वह सत्य बोले तो कैसे बोले, क्योंकि उसके पास आने की हिम्मत तो किसी की थी नहीँ,वह खुद भी किसी के पास जाता तो उसे देखते ही सामने वाला जान बचा कर भाग जाता।
किन्तु अब तय कर लिया था तो सच भी बोलना ही था।
आख़िर उसे एक उपाय सूझ ही गया।  वह सुबह जब अपनी माँद से निकलता तो जोर से चिल्लाता कि मैं  आ रहा हूं,और जो भी मुझे राह में मिलेगा मैँ उसे मार कर खाऊँगा।
अब तो उसकी राह में कोई परिंदा भी कभी पर नहीँ मारता था। भूख से तड़पता हुआ वह थोड़े ही दिनों में मरणासन्न हो गया। उसे बेदम पड़े देख कर आसपास के जानवर उसकी मिज़ाज़पुर्सी को वहाँ आने लगे। वह उन्हें अपनी कहानी सुनाता कि कैसे उसने खुद अपना ये हाल किया।
आख़िर एक दिन एक नन्हे बटेर ने उससे पूछ ही लिया -"चाचा,सच बोलने की क़सम लेने से पहले तुम शिकार कैसे करते थे?"
शेर ने कहा-"मैं बिना कुछ बोले दबे पाँव शिकार पर झपटता था।"
बटेर ने हैरत से कहा-"तो फिर बोलने के चक्कर में पड़े ही क्यों? तुम झूठ बोलकर तो नहीं खा रहे थे !"
पर अब क्या हो सकता था, जब चिड़िया चुग गई खेत।                    

Tuesday, May 6, 2014

गलती हमारी ही है,

 हम सब बहुत सारे लोग थे, सब एक दूसरे के दोस्त।  हँसते थे, गाते थे, मिलते थे, खिलते थे।  एक दूसरे की सुनते थे, एक दूसरे  की कहते थे।
फिर चुनाव आया।  हम औरों की सुनने लगे।  कोई चिल्लाता था, कोई फुसफुसाता था, कोई  गरजता था, कोई  बरसता था, कोई आग उगलता था, तो कोई बर्फ गिराता था।
बैठ गए हम सब, अपना -अपना  दूध का कटोरा लेकर  नींबू के पेड़ के नीचे !
अब हम सेक्युलर हैं, सांप्रदायिक हैँ, सवर्ण हैं, दलित हैँ, पिछड़े हैँ,उदार हैं, प्रगतिशील हैं, दकियानूसी हैँ, खुद्दार हैँ, चापलूस हैं.
औरों से मत पूछिये, हम हैँ कौन जनाब ?
अपने मन से कीजिये,अपने जन्म-हिसाब!  
  

Monday, May 5, 2014

लहरें

लहरें, हिलोरें, जलजले, झंझावात, सब होते हैं. आप इन्हें देखें, न देखें, ये होते हैं.
जब सागर तट पर लोगों का हुजूम हो, लहरें तब भी होती हैं. भिनसारे या देर रात जब नीरव निशब्द सागर तट पर कोई भी नहीं होता, मछुआरे तक नहीं, लहरें तब भी होती हैं. ज्वार में, भाटे में, कम या ज्यादा, किन्तु लहरें होती हैं.
लहरें पानी को साफ़ करती हैं. लहरें सन्नाटे तोड़ती हैं. लहरें जम गई काई या मिट्टी को हटाकर तलों को एकसार करती हैं. लहरें मल्लाहों को पसीने ला देती हैं.लहरें ठहरे पानी में मलाल भरती हैं.लहरें बहते पानी में जलाल भरती हैं. लहरें बरसते पानी में थिरकन जगाती हैं.
लहरें जनमानस के ह्रदय-दालान में अंतःक्षेप करके तुलसी के खुशबूदार बिरवे रोपती हैं.
लहरें जनजीवन के मस्तिष्क-आलोड़न से नागफ़नियों के फ़न कुचल देती हैं.
इनके विध्वंसक, इनके नियामक, इनके सृजनकारी आयामों को निहारने का अपना अलग ही मज़ा है.
आइये, इनकी राह देखें !                      

Saturday, May 3, 2014

ये बात तो काफी पुरानी है,अब तो और भी नस्लें होती होंगी?

   किसी विद्वान ने इतिहास में हुए राजाओं को भ्रष्टाचार से निपटने के उनके तरीके के आधार पर चार किस्मों में बाँट दिया.
पहली किस्म उन राजाओं की थी जो न तो स्वयं भ्रष्टाचार करते थे और न ही किसी और को ऐसा करने देते थे.
दूसरी श्रेणी उन राजाओं से बनी,जो जनता का भ्रष्ट होना तो स्वीकार कर लेते थे, पर स्वयं किसी तरह का भ्रष्टाचार नहीं करते थे.
तीसरी जमात में वे राजा आते थे जो थोड़े बहुत भ्रष्टाचार को बुरा नहीं समझते थे, वे खुद भी इसमें लिप्त हो जाते थे और प्रजा को भी इसकी अनुमति दे देते थे.
चौथा वर्ग उन दबंग राजाओं का था जो जनता का भ्रष्टाचारी होना कतई बर्दाश्त नहीं करते थे,और जो कुछ हेरा-फेरी या भ्रष्टाचार करना हो, उसे स्वयं ही सम्पादित करते थे.
इन गुणों के आधार पर ही इन राजाओं के शासन की अवधि भी निर्धारित होती थी.
पहली श्रेणी के राजाओं के राज का सूरज जम कर चमकता था किन्तु जल्दी ही अस्त हो जाता था.
दूसरी किस्म के राजाओं के राज की नैय्या डगमगाती रहती थी और जल्दी ही डूब भी जाती थी.
तीसरी प्रकार के राजा अपना शासन लम्बे समय तक खींच ले जाते थे.
चौथी प्रकार के राजा सिंहासन से कभी नहीं हटते थे, वे पदार्थ की भांति अवस्था बदल कर,बहरूपियों की भांति रूप बदल कर, पवन की तरह दिशा बदल कर, अथवा जल की नाईं तल बदल कर किसी न किसी भांति सत्ता में बने रहते थे.
भारतीय रंगमंच के ग्रीनरूम में इस समय ऐसे कई राजा चोले बदलने में व्यस्त हैं.अपनी तेरहवीं पर, क्षमा कीजिये,आज से तेरह दिन बाद,वे नए अवतार में, नए चोले में पुनर्जन्म पा फिर राजयोग भोगेंगे।                     

हम मेज़ लगाना सीख गए!

 ये एक ज़रूरी बात थी। चाहे सरल शब्दों में हम इसे विज्ञापन कहें या प्रचार, लेकिन ये निहायत ज़रूरी था कि हम परोसना सीखें। एक कहावत है कि भोजन ...

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