Tuesday, June 7, 2011

शुतुरमुर्ग मोर से ज्यादा भा रहा है सत्तानवीसों को

शुतुरमुर्ग जितना बड़ा होता है, उसका सर उतना ही छोटा. और यह कहावत है कि जितना सर उतनी बुद्धि. इसी लिए शुतुरमुर्ग को अपने जिस्म से ज्यादा चिंता अपने सर की होती है. कहते हैं कि जब आंधी आती है तो वह केवल अपना सर रेत में छिपा लेता है, और अपने को सुरक्षित समझने लगता है.इस बार भ्रष्टाचार के विरोध की आंधी आई तो दिल्ली की सल्तनत ने सोचा, बस अपना सर, यानी कि  दिल्ली को बचा लो और बाकी देश को भूल जाओ.लिहाज़ा बाबा रामदेव को दिल्ली की सीमाओं से बाहर निकाल कर सरकार अपने को सुरक्षित समझने लगी.    इस तरह एक बार फिर "रक्कासा सी नाची दिल्ली". इसी दिल्ली के राज में रोज़ शेर भी मर रहे हैं और मोर भी. अर्थात जंगल का राजा भी और बागों का राजा भी. 
थोड़े दिन पहले जब एक समुदाय द्वारा इकट्ठे होकर रेल की पटरियां उखाड़ी जा रही थी तब सरकार को उधर देखने की फुर्सत भी नहीं थी क्योंकि तब सारी रेलें रोक कर बंगाल की कुर्सी का इंतजाम किया जा रहा था. पर अब सरकार को तुरंत एक घंटे में ही एक्शन लेना पड़ा. दूसरी तरफ कुछ लोगों का यह कहना भी अचंभित करने वाला है कि चुने हुए लोगों को इस तरह भीड़ की बातें नहीं माननी चाहिए. शायद वे यह भूल गए कि यह भीड़ वही है जिसके सामने दंडवत करने का मौसम हर पांच साल बाद आता है. 

Sunday, June 5, 2011

अपने ढोल पर अपनी थाप

कुछ दिन पहले मेरे एक पाठक का पत्र आया [आजकल पत्र नहीं आते, पर छोटी जगहों के बड़े लोग अब भी कभी-कभी लिखते हैं] कि मुझे बहुत पढ़ लेने के बाद भी वे मेरे बारे में यह नहीं जान पाए हैं कि निजी ज़िन्दगी में मेरी उपलब्धियां क्या हैं? 
यदि इसमें किसी की रूचि हो सकती है तो मुझे कहने में क्या संकोच? मैं आज आपको अपने जीवन की दस उपलब्धियां, मेरे पसंद-क्रमानुसार बताता हूँ, लेकिन इसे यह मत कहियेगा-"अपने ढोल पर अपनी थाप".कभी-कभी पाठकों के लिए 'कहना पड़ता है'.क्रम दस से एक है, अर्थात उल्टा. 
१०. मुझे अपने कैरियर में भारत के एक ऐसे गाँव,जिसमे बिजली और पानी की भी व्यवस्था नहीं थी, कच्चे रस्ते से पैदल सूखी नदी  पार करके बस्ती तक जाना होता था,से लेकर भारत के सबसे बड़े नगरों की सबसे आलीशान कॉलोनियों में वातानुकूलित दफ्तरों में काम करने का मौका मिला, जहाँ जाने-माने अरबपतियों से लेकर फ़िल्मी सितारों तक से आसानी से मिलना-जुलना हो जाता था. 
९. मुझे मुंबई में  अमिताभ बच्चन के आवास 'प्रतीक्षा' में उनके पिता श्री हरिवंश राय बच्चन पर लिखने के कारण जाने का अवसर मिला जिसमे जया बच्चन और अभिषेक बच्चन से मिलने का अवसर भी मिला. 
८.मुझे अपने जीवन के तमाम अवसर ज्यादा मेहनत के बिना प्राप्त हुए, यहाँ तक कि अपने आवास के निर्माण तक के लिए मेरा श्रम नगण्य है. मुझे परिजनों से सहयोग मिला. 
७. मुझे देश के दो जाने-माने विश्व-विद्यालयों में प्रतिष्ठा-पूर्ण स्थान सहज-संयोग से प्राप्त हुए. 
६. मुझे उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का बड़ा पुरस्कार बिना आवेदन किये अथवा बिना कोई अनुशंसा करवाए अकस्मात् प्राप्त हुआ .
५. मैंने अपने कैरियर में बारह ऐसे क्षेत्रों में लगातार काम किया जिनमे से किसी एक को भी लोग अपना पूरा कैरियर बना लेते हैं. इनमे किसी भी क्षेत्र को असफल होकर छोड़ने की ज़रुरत कभी महसूस नहीं की.[ ये क्षेत्र हैं- बैंकिंग, पत्रकारिता, विज्ञापन, संपादन, सृजनात्मक लेखन, प्रशासन, अध्यापन, प्रबंधन, सतर्कता, राजनैतिक जागरूकता, समाज सेवा, सरकारी राज्य-स्तरीय कार्यक्रमों का समन्वयन. ] 
४. मैंने एक बार भारतीय प्रबंध संस्थान[आइआइएम] में प्रवेश लेना चाहा  था,किन्तु सामानांतर दूसरा अवसर मिलने के कारण मैं उस से जुड़ नहीं सका था, परन्तु मुझे बच्चों के माध्यम से उस से निकटता से जुड़ने का मौका मिला. 
३. मुझे फिल्म-स्टार व प्रोड्यूसर राजेंद्र कुमार ने अपने पुत्र कुमार गौरव के लिए लिखने हेतु अपने आवास पर आमंत्रित किया.
२. मुंबई में रहते हुए बिना किसी संपर्क या अनुशंसा के दिल्ली के एक प्रकाशक ने मेरी ६ पुस्तकों का प्रकाशन किया. [केवल अखबारों में छपी कहानियों के आधार पर] 
१. मुझे लम्बे समय तक दुनिया के सबसे बड़े देश में रहने का अवसर मिला, जो कि कभी मेरे पिता का भी सपना था. [वे विश्व के एक महान लेखक की पुस्तक का भारतीय छात्रों के लिए रूपांतरण कर रहे थे.]       

Saturday, June 4, 2011

वाद कमीज़ उतारें या पहनें पर रामदेवजी कहाँ हैं?

थोड़ी देर पहले मैंने साम्यवाद और पूंजीवाद का अंतर बताने के लिए जो उदाहरण दिया था, वह मेरे एक मित्र को समझ में नहीं आया. मैं उसे थोड़ा विस्तार से बता ही रहा था कि मेरे मोबाइल पर सन्देश आया- बाबा रामदेव को सरकार ने लापता कर दिया है, अतः विरोध प्रकट करने के लिए बुद्धि-शुद्धि यज्ञ करें.मैं असमंजस में पड़ गया.
मैंने जो उदाहरण दिया था, उसके अनुसार एक पेड़ के नीचे मंहगी ब्रांडेड कमीज़ पहन कर एक लड़का बैठा है. पूंजीवाद के अनुसार वह संतुष्ट और सम्पन्न है. लड़के को गर्मी लग रही है और कमीज़ नई होने से थोड़ी असुविधा भी हो रही है, साम्यवाद कहता है कि वह उसे उतार फेंके[समाजवाद कहता है कि उतार कर करीने से रख दे] पर पूंजीवाद कहता है कि वह पंखा,कूलर या एसी  का इंतजाम करले.
अब रामदेव जी के समाचार से इस बात को जोड़ देना वक्त का तकाजा है. बाबा रामदेव के सत्याग्रह से सरकार को गर्मी लगी. सरकार के पास भी तात्कालिक रूप से तीन विकल्प थे. पहला, सरकार उनकी बात मानते हुए भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंके या कम से कम उस दिशा में कोई कदम उठाती दिखाई दे.दूसरा विकल्प यह था कि वह रामदेवजी, अन्ना हजारे आदिको साथ लेकर इस देशव्यापी समस्या को जड़ से मिटाने के लिए कोई दीर्घकालीन कार्य-योजना बनाने की दिशा में बढे. तीसरा विकल्प यह था कि आधी रात को उनको तितर-बितर करने के लिए आंसू-गैस लेकर हमला कर दे और उन्हें जबरन उठा कर उनके समर्थकों की नज़र से ओझल करने के लिए इधर-उधर करती रहे. कौन सा विकल्प किस वाद के तहत आता है, यह तो कुछ साल बाद तय होगा जब देश के विश्व-विद्यालय अपनी बोर्ड ऑफ़ स्टडीज़ की बैठकों में ऐसे विकल्पों को मंज़ूर करके इनके "वाद" निर्धारित कर देंगे, पर अभी रामदेवजी को तो ढूंढो. सरकार भीड़ से नहीं डरती. डरती है तो भीड़ के नेता से.        

अफ्रीका में साम्यवाद क्यों नहीं फैलता?

क्यों नहीं फैलता अफ्रीका में साम्यवाद, इस प्रश्न के कई उत्तर हैं. सबसे प्रासंगिक उत्तर जो इस समय ग्राह्य हो सकता है, वह है- "क्योंकि वह कहीं नहीं फैलता". लेकिन इस उत्तर से साम्यवादी विचारधारा के लोग संतुष्ट नहीं होंगे.यदि वे सचमुच साम्यवादी हैं तो उन्हें होना भी नहीं चाहिए. क्योंकि साम्यवाद की ही एक परिभाषा यह भी है कि वह अंतिम रूप से सामाजिक ढांचे से कभी संतुष्ट न हो. किसी भी समाज के लिए अपनी स्थिति से संतुष्ट होना उसके विकास और बेहतरी के प्रयत्नों का पटाक्षेप है. और ऐसी स्थिति कहीं भी, कभी भी काल्पनिक ही होनी चाहिए, वास्तविक नहीं. 
कुछ लोग यह सवाल भी उठा सकते हैं कि वह क्यों फैले? वास्तव में वह जब भी फैला, जहाँ भी फैला, इसलिए फैला क्योंकि वह पूँजी को भगवान नहीं मानता.पूँजी मंदिर तो हो सकती है पर ईश्वर नहीं.मंदिर और ईश्वर एक बात नहीं है. लाखों लोग मंदिर जाते हैं पर वे ईश्वर के करीब भी नहीं फटकते. दूसरी तरफ, कुछ लोग ईश्वर का साक्षात्कार कर लेते हैं पर वे मंदिर जाने का समय नहीं निकाल पाते. साध्य और साधन में फर्क है ही, और वह हमेशा रहेगा.
एक बार शहर से काफी दूर एक संस्थान ने मुझे किसी कार्यक्रम में भाषण देने के लिए आमंत्रित किया. मैं घर से निकलने में लेट हो गया, पर मेरे ड्राइवर ने बड़ी कुशलता से तेज़ गाड़ी चलाकर मुझे समय पर पहुंचा दिया. मैंने उसकी हौसला अफज़ाई के लिए उस से कहा-असली 'चीफ गेस्ट' तो तू है, यदि तू मुझे नहीं लाता तो मैं समय पर आ ही नहीं पाता.वह तपाक से बोला- सर, मैं यहाँ आ भी जाता तो यहाँ आकर करता क्या? और आप न आते तो मुझे बुलाता कौन? 
साध्य और साधन का अंतर तो है ही. 
अफ्रीका में साम्यवाद न फैलने का कारण यही है कि वहां की जीवन-शैली में साम्यवाद के अंतिम लक्ष्य के तत्व पहले से ही मौजूद हैं. हम पहले वहां कुछ समय के लिए पूंजीवाद पहुंचा दें, फिर शायद कभी वे भी प्रतीक्षा करें कि साम्यवाद कब आएगा? 
एक पेड़ की छाँव में बैठे लड़के के तन पर यदि महँगी ब्रांडेड कमीज़ है तो पूंजीवाद उसे संतुष्ट मानेगा, पर यदि कमीज़ से असुविधा महसूस करके लड़का उसे उतार फेंके, तो साम्यवाद उसे संतुष्ट मानेगा. 
तो अफ़्रीकी जीवन-शैली में साम्यवाद आकर क्या करे?        

जब क्रिस्टीना कंकनाप्पा ने पहने सोफिया लॉरेन के सेंडिल

हमारे धर्म-ग्रंथों में ऐसा उल्लेख मिलता है कि एक बार हनुमान ने सूर्य को निगल लिया था. तब चारों ओर अन्धकार छा गया. अन्धकार छा जाना स्वाभाविक है क्योंकि संसार को उजाला, उष्मा और ऊर्जा देने वाला स्रोत सूर्य ही है. जब सूर्य को निगल लिया गया तो ज़ाहिर है कि विश्व के सभी देश अँधेरे में डूब गए होंगे, क्योंकि सूर्य अकेला विश्व के सभी देशों की शक्ति का स्रोत है. लेकिन विश्व के अन्य देशों के इतिहास में न तो इस अँधेरे का कहीं उल्लेख मिलता है और न ही अस्तित्व . इसी आधार पर हम कह सकते हैं कि हमारी सभ्यता [सूर्य को निगल लेने की भी] सबसे पुरानी है.हमारी सभ्यता आज तक इसीलिए जीवित और टिकाऊ है क्योंकि हमारे धर्म-ग्रंथों में यह बातें सप्रमाण लिखी हुई मौजूद हैं.और हमारा कोई भी अनुसंधान या शोध हमारे धर्म-ग्रंथों को लांघ कर कभी नहीं जाता, कहीं नहीं जाता. यूं हम बीच-बीच में शौकिया तौर पर करेंट अफेयर्स की बातें भी कर लेते हैं. 
तो एक करेंट अफेयर यह है कि कुछ दिनों पूर्व एक काफी पुरानी विश्व-सुंदरी क्रिस्टीना कंकनाप्पा ने एक और अति-पूर्व विश्व- सुंदरी सोफिया लॉरेन के सेंडल पहन कर कैटवाक  किया. इतनी वृद्ध विश्व-सुंदरी के सेंडल अब कोई नए फैशन के तो होंगे नहीं. ज्यादा महंगे भी होने से रहे, क्योंकि महंगाई हमेशा बढती है, घटती नहीं.क्रिस्टीना सोफिया से कई साल छोटी सही, पर अब कोई युवा नहीं होंगी, क्योंकि वे भी अस्सी के दशक की विश्व-सुंदरी हैं. वे क्यों कैटवाक करेंगी? और करेंगी भी तो अपनी खुद की चप्पल पहन कर क्यों नहीं? 
बात समझ में नहीं आती. परन्तु इस पर अविश्वास भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह खबर एक अखबार में छपी थी. और तुर्रा ये, कि यह खबर उस अखबार में छपी थी जिसके मुखपृष्ठ पर बड़े-बड़े अक्षरों में छपा था-  भारत का सबसे प्रामाणिक अखबार.कोई झूठी बात भला क्यों छापेगा ?अखबार  के लिए तो जैसी कनिमोझी वैसी क्रिस्टीना.    

Thursday, June 2, 2011

केन्या, ज़िम्बाब्वे और साऊथ अफ्रीका को क्रिकेट में कौन लाया?

एक मकान की छत पर विचारों में तल्लीन एक व्यक्ति टहल रहा था. तभी उसके ठीक सामने कुछ दूरी पर एक बड़ा सा पत्थर तेज़ी से आकर गिरा. व्यक्ति ने क्रोध से तमतमाकर चिल्लाते हुए कहा- ये पत्थर यहाँ कौन लाया? 
संयोग से उसी समय आकाश से कुछ देवदूत गुज़र रहे थे. आवाज़ सुन कर एक देवदूत बोल पड़ा- इसे तुम्हारे पड़ौसी बच्चे की शरारत यहाँ लाई.आदमी ने चौंक कर ऊपर देखा. तभी दूसरा देवदूत बोल पड़ा- इसे पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति यहाँ लाई. आदमी हैरान होकर कुछ कहता, इस से पहले ही तीसरा देवदूत चिल्लाया- इसे खुद तुम्हारी शरारत यहाँ लाई, तुम बच्चों को गली में खेलने जो नहीं देते? 
यह सब सुनकर व्यक्ति गुस्से से पागल हो गया. वह उन देवदूतों को श्राप देने के से अंदाज़ में बोला- तुम में से जिसकी भी बात गलत हो, वही आकर ज़मीन पर गिरे. पर ज़मीन पर कोई नहीं गिरा. 
तो ज़िम्बाब्वे, केन्या और साऊथ अफ्रीका को क्रिकेट में क्रिकेट का "पूंजीवाद" लाया. खेलों का भौगोलिक "साम्राज्यवाद" लाया. वहां के खिलंदड़े युवाओं के जुनून का "समाजवाद" लाया. एशिया, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप महा-द्वीपों से अमेरिका की दिशा में बढ़ी क्रिकेट-ज्वर की लहर का "साम्यवाद" लाया, और विश्व-मीडिया का "बाजारवाद" लाया.
यदि ज़मीन पर अगले कुछ सालों में कोई देवदूत नहीं गिरा, तो शायद हम ज़ल्दी ही अमेरिका को भी विश्व-क्रिकेट में देखें.   

Wednesday, June 1, 2011

अफ्रीका ,आफरीदी ,अफ़सोस, अफरा-तफरी

'सबकी' 'साऊथ''सचमुच'और 'शाहिद' इन चारों शब्दों को ध्यान से देखिये और फिर ऊपर के शीर्षक के चारों शब्दों के साथ इनका मैच मिलाइए. जैसे उदाहरण के लिए यदि आप समझते हैं कि अफ़सोस के साथ 'सचमुच' लगना चाहिए, तो लिखिए-सचमुच अफ़सोस. 
हमारे प्रधानमंत्री ने कहा है कि यह 'सचमुच अफ़सोस' की बात है कि बाबा रामदेव लोगों को योग सिखाते-सिखाते अचानक अपना कुलयोग लाखों के पार ले गए. क्षमा कीजिये, प्रधानमंत्री के यह शब्द नहीं थे, यह तो मेरी भाषा में उनकी बात का भावार्थ है. उनका कहना तो यह था कि सचमुच अफ़सोस की बात है कि लोगों की नब्ज़ पहचानने वाले रामदेव सरकार का नजरिया नहीं पहचान पा रहे.उधर अन्ना तो पहले से ही हजारे हैं. एक अखबार ने तो आज लिख भी दिया कि अब दिल्ली में "अन्ना हजारों" हैं. वैसे पुरानी कहावत तो यह है कि बिल्लियाँ दो हो जाने से फायदा हमेशा बन्दर को होता रहा है. फिर भी कोई जंतर-मंतर में बार-बार मंतर फूंकेगा तो भूत कभी न कभी तो भागेगा ही न? सो अफरा-तफरी मचनी स्वाभाविक है, वह भी सबकी. 
हमारे देश के लोग क्रिकेटरों को सर-आँखों पर बैठाते  हैं.वे धोनी और आफरीदी में भी कोई फर्क नहीं करते. पर आफत की बात तो यह है कि आफरीदी अफ्रीका के नहीं, पाकिस्तान के स्टार हैं. इसलिए हमारी जनता का उनसे प्रेम केवल अफसाना बन कर रह जाता है, कभी हकीकत नहीं बनता. अब आप समझ गए होंगे कि अफ्रीका में साम्यवाद क्यों नहीं आता? खैर, अभी हमारी पहली प्राथमिकता अन्ना और बाबा हैं. प्रधानमंत्री दोनों को साथ लेकर प्रयास करें तो तिहाड़ पर मंजिलें चढ़ते-चढ़ते कुतुबमीनार को टक्कर दे सकती हैं, बशर्ते तिहाड़ में मंजिलें चढाने का काम आदर्श सोसाइटी के कर्णधारों को न दिया जाये.       

शोध

आपको क्या लगता है? शोध शुरू करके उसे लगातार झटपट पूरी कर देने पर नतीजे ज़्यादा प्रामाणिक आते हैं या फिर उसे रुक- रुक कर बरसों तक चलाने पर ही...

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