Friday, December 26, 2014

कैसा लगता है आपको ये?

मुझे याद है, बचपन में यदि हम कभी अपने से थोड़े से बड़े लड़कों के साथ भी खेलने-घूमने का आग्रह करते थे तो वे टाल देते थे, कहते थे अपने साथ वालों के पास जाओ,वहीँ खेलो।कभी-कभी तो झिड़क भी दिया जाता था- बड़ों के बीच नहीं।
लड़कियों के बीच जाने का तो सवाल ही नहीं।  शर्म नहीं आती लड़कियों की बातें सुनते?
बड़े लोग सतर्क रहते थे, हम उनके बीच उन्हें चाय-पानी देने तो जा सकते थे, पर बैठने-बतियाने नहीं।  फ़ौरन सुनना पड़ता था-बेटा, बच्चों के बीच खेलो।
हमेशा मन में ये शंका सी होती रहती थी कि आखिर ये लोग ऐसी क्या बातें कर रहे हैं, जो हम नहीं सुन सकते। ऐसा लगता था कि सबका अपना-अपना एक छोटा सा गुट है और उसके बाहर जाना अशोभनीय।
अब???
अब तो मज़े हैं।  अस्सी साल की उम्र में कोई किस्सा कहिये और झटपट पंद्रह साल के किशोर से उस पर "लाइक"लीजिये। आप सत्रह साल के नवोदित कवि को किसी प्रवचनकार की मुद्रा में अपनी कविता किसी ऐसे बुजुर्ग को तन्मयता से सुनाते देख सकते हैं, जो पच्चीस किताबें लिख चुका है।
बड़े-छोटे-महिला-बुजुर्ग कोई विभाजन नहीं।
किसी महल में बैठे राजा भोज पर दूर-देहात के गंगू तेली को बेसाख़्ता हँसते देखिये। जंगल में किसी बाज़ के हाथों घायल परिंदे पर आँसू बहाते दूर-देश के बॉक्सिंग चैम्पियन को देखिये।
कैसा लगता है आपको ये? आपके ऑप्शंस हैं-अच्छा, बहुत अच्छा,बहुत ही अच्छा!         

1 comment:

  1. तुमने बचपन की झिझक और आज की खुली दुनिया का फर्क बहुत सटीक पकड़ा है। मैं भी याद करता हूँ कि बड़े लोग हमें अपने घेरे से दूर रखते थे और हम बाहर खड़े अंदाज़ लगाते रहते थे। अब सोशल मीडिया दीवारें गिरा देता है और उम्र का फर्क छोटा कर देता है।

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