आइये दो मिनट का मौन रखलें.वक्त ने हमें इसी लायक छोड़ा है.हमारे सामने मजबूरियां ही मजबूरियां हैं.हम कर कुछ नहीं सकते.हमें वरदान या शाप मिला हुआ है कि हम केवल पांच बरस में एक बार ही हाथ-पाँव हिलाएंगे ,वह भी तब, जब कुर्सियों पे बैठने-बिठाने का मौसम आये.
प्रकाशित पुस्तकें
उपन्यास: देहाश्रम का मनजोगी, बेस्वाद मांस का टुकड़ा, वंश, रेत होते रिश्ते, आखेट महल, जल तू जलाल तू
कहानी संग्रह: अन्त्यास्त, मेरी सौ लघुकथाएं, सत्ताघर की कंदराएं, थोड़ी देर और ठहर
नाटक: मेरी ज़िन्दगी लौटा दे, अजबनार्सिस डॉट कॉम
कविता संग्रह: रक्कासा सी नाचे दिल्ली, शेयर खाता खोल सजनिया , उगती प्यास दिवंगत पानी
बाल साहित्य: उगते नहीं उजाले
संस्मरण: रस्ते में हो गयी शाम,
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शोध
आपको क्या लगता है? शोध शुरू करके उसे लगातार झटपट पूरी कर देने पर नतीजे ज़्यादा प्रामाणिक आते हैं या फिर उसे रुक- रुक कर बरसों तक चलाने पर ही...
दुखद स्थिति है!
ReplyDeleteGOVIL JI
ReplyDeletesach kahane aur sach ke saath khare hone ke liye dhanywad