पिछले कुछ समय से सभी दिशाओं में आतंक का जैसा जयकारा गूँज रहा था उस से यह शंका ज़रूर उपजती थी कि कहीं कोई विध्वंसक दिमाग दबा पड़ा है जो राख की चिंगारियों में जब-तब फूंक मारता रहता है.शक की सुई कई मुल्कों के इर्द-गिर्द डोलती रहती थी किन्तु केवल संदेह के आधार पर कुछ ठोस कहा नहीं जा पाता था.हर भू-डोल या तबाही का कोई न कोई कारण होता ज़रूर है, चाहे प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न दे. यहाँ अमेरिका ने एक बार फिर अपनी भूमिका का निर्वाह किया. जिस सफाई से सब कुछ ख़त्म करके विश्व को सूचना दी गई यह अमेरिका का ही बूता था.कुछ ऐसे मुल्क और लोग जो अमेरिका की हर कारगुजारी को ठंडेपन और अवहेलना से देखने के आदी हैं, शायद फिर अपने मुंह की मक्खियाँ उड़ाने में कुछ समय लेंगे, उसके बाद ही कुछ कह पाएंगे, लेकिन वे जब भी जुबान की जुम्बिश का मन बनायेंगे, कम से कम ये तो स्वीकार करेंगे ही कि अमेरिका व्यावसायिक उथल-पुथल में भी अपने और दुनिया के अमन-चैन से खेलने वालों को दंड देने की अपनी ज़िम्मेदारी नहीं भूला. और भारत के सन्दर्भ में बात करें तो यह सोचने में भी कोई संकोच नहीं है कि लोग इसे अमेरिकी राष्ट्रपति के आगामी चुनाव से जोड़ कर देखेंगे और इसे सही वक्त पर करिश्मा करने की संज्ञा ही देंगे. इसमें भारतीय जन-मानस को कोई दोष भी नहीं दिया जा सकता क्योंकि भारतीय नेताओं ने उसे यही सिखाया है. हम वोटों के मौसम में ही खिलने के आदी हैं. बहरहाल भविष्य के हर ओसामा को नियति पर सोचने का एक मौका तो मिलेगा.
प्रकाशित पुस्तकें
उपन्यास: देहाश्रम का मनजोगी, बेस्वाद मांस का टुकड़ा, वंश, रेत होते रिश्ते, आखेट महल, जल तू जलाल तू
कहानी संग्रह: अन्त्यास्त, मेरी सौ लघुकथाएं, सत्ताघर की कंदराएं, थोड़ी देर और ठहर
नाटक: मेरी ज़िन्दगी लौटा दे, अजबनार्सिस डॉट कॉम
कविता संग्रह: रक्कासा सी नाचे दिल्ली, शेयर खाता खोल सजनिया , उगती प्यास दिवंगत पानी
बाल साहित्य: उगते नहीं उजाले
संस्मरण: रस्ते में हो गयी शाम,
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शोध
आपको क्या लगता है? शोध शुरू करके उसे लगातार झटपट पूरी कर देने पर नतीजे ज़्यादा प्रामाणिक आते हैं या फिर उसे रुक- रुक कर बरसों तक चलाने पर ही...
सोलह आने सही बात..Please remove word verification..
ReplyDeleteaapko baat sau paise sahi lagi, to tay ho gaya ki yah sahi hi hogi.
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