Sunday, October 30, 2016

ऐसा कैसे हो सकता है?

संभवतः किसी भी क्षेत्र में नोबल पुरस्कार को सबसे अधिक प्रतिष्ठित और सम्मानजनक पुरस्कार माना जाता है। कई देश अपने इतिहास तक को जब-तब ये कह-कह कर कुरेदते रहते हैं कि अमुक को ये पुरस्कार क्यों नहीं मिला, अथवा फलाने को ये पुरस्कार कैसे मिल गया ?
लेकिन इस वर्ष साहित्य के नोबल पुरस्कार की घोषणा के बाद एक अलग ही नज़ारा सामने आया। अमरीकी गीतकार व संगीतकार बॉब डिलेन को जब ये पुरस्कार देने की घोषणा हुई तो दुनिया एकाएक ये नहीं जान पाई कि उन्हें ये ईनाम पाकर कैसा लगा ?
न तो उनकी कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया सामने आई और न ही वे खुद सामने आये। पुरस्कार समिति ये कहती रही कि उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है।
ऐसे में कुछ न कुछ सुगबुगाहट तो होनी ही थी। अब तो दुनिया में सोशल मीडिया का ऐसा बोलबाला है कि यदि आप सामने न आये तो दुनिया सामने आ जाएगी।
तो आइये, देखें कि कैसी-कैसी प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं इस मसले पर-
कुछ लोग कह रहे हैं कि जब-जब किसी अपात्र [कुपात्र भी] को ये सम्मान मिला है तो उसका असमंजस सामने आया ही है।
कहा ये भी जा रहा है कि अब मीडिया नकारात्मक है, सम्मानित होने पर इतना नहीं छापता जितना सम्मान ठुकराने या उसे लेने में अचकचाने पर।
छी-छी कैसी सोच है लोगों की? ये तक कहा जा रहा है कि "साहित्य" का तमगा संगीत को जायेगा तो आलाप लेने में कुछ वक़्त तो लगेगा ही। एकाएक झटके से पर्दा कैसे उठ जायेगा ?
सही है, सुर उठाने या कलम साधने में ही समय लगता है, प्रतिक्रिया देना तो उतावली का काम है।           

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